विस्तृत उत्तर
सामान्य प्रलय नियत काल और नियम से होता है, पर यह प्रलय महाविष्णु की श्वास रुकने से असमय शुरू हुआ। इसमें न संवर्तक अग्नि थी, न तय प्रलय-क्रम।
यह प्रलय सामान्य प्रलय से अलग कैसे था को संदर्भ सहित समझें
यह प्रलय सामान्य प्रलय से अलग कैसे था का सबसे सीधा सार यह है: यह नियत काल का नहीं, श्वास अवरोध से उठा अकाल प्रलय था।
लोक जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.
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इसी विषय के 5 प्रश्न
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मार्कण्डेय मुनि की तपस्या और महर्लोक के बीच क्या संबंध है?
मार्कण्डेय मुनि की अखंड तपस्या उन्हें महर्लोक का अधिकारी बनाती है। नैमित्तिक प्रलय के एकार्णव में उन्होंने अपने योगबल से विचरण करते हुए भगवान विष्णु के बालक स्वरूप के दर्शन किए।
मार्कण्डेय पुराण में महर्लोक का वर्णन कैसे है?
मार्कण्डेय पुराण में वर्णन है — नैमित्तिक प्रलय में त्रैलोक्य के निवासी महर्लोक की ओर भागते हैं पर महर्लोक के ऋषि स्वयं जनलोक जाते हैं। एकार्णव से महर्लोक अपनी ऊँचाई से बचता है।
ब्रह्माण्ड पुराण में महर्लोक के मन्वन्तर संबंध का वर्णन कैसे है?
ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार प्रत्येक मन्वन्तर के बाद सेवानिवृत्त इन्द्र, मनु और सप्तर्षि महर्लोक में आते हैं। उनका तेज ब्रह्मा के समान होता है और वे पाँच आध्यात्मिक ऐश्वर्यों से युक्त होते हैं।
गीता के 'आब्रह्मभुवनाल्लोकाः' का महर्लोक पर क्या अर्थ है?
गीता (८.१६) का 'आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन' महर्लोक पर भी लागू है — यह भी पुनरावर्ती है। यहाँ से मोक्ष न मिला तो नई सृष्टि में वापसी होती है।
विष्णु पुराण के छठे अंश में महर्लोक के संताप का वर्णन क्या है?
विष्णु पुराण (६.३.२८-२९) में वर्णन है कि संकर्षण की अग्नि का भयंकर ताप महर्लोक को संतापित करता है जिससे भृगु आदि महर्षि इसे छोड़कर जनलोक की ओर पलायन करते हैं।
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