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श्रीमद्भगवद्गीता · भक्ति योग

श्लोक 14

भक्ति योग · Bhakti Yoga

मूल पाठ

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः | मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट,योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला, मेरेमें अर्पित मन-बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट,योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला, मेरेमें अर्पित मन-बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।

English Meaning

Ever content, steady in meditation, self-controlled, possessed of firm conviction, with the mind and intellect dedicated to Me, he, My devtoee, is dear to Me.

Ever content, steady in meditation, self-controlled, possessed of firm conviction, with the mind and intellect dedicated to Me, he, My devtoee, is dear to Me.

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