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श्रीमद्भगवद्गीता · दैवासुर सम्पद् विभाग योग

श्लोक 1

दैवासुर सम्पद् विभाग योग · Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

मूल पाठ

श्री भगवानुवाच | अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः | दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

श्रीभगवान् बोले -- भयका सर्वथा अभाव; अन्तःकरणकी शुद्धि; ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियोंका दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालनके लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणीकी सरलता।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

श्रीभगवान् बोले -- भयका सर्वथा अभाव; अन्तःकरणकी शुद्धि; ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियोंका दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालनके लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणीकी सरलता।

English Meaning

The Blessed Lord said Fearlessness, purity of heart, steadfastness in knowledge and Yoga, almsgiving, control of the senses, sacrifice, study of scriptures, austerity and straightforwardness.

The Blessed Lord said Fearlessness, purity of heart, steadfastness in knowledge and Yoga, almsgiving, control of the senses, sacrifice, study of scriptures, austerity and straightforwardness.

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