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श्रीमद्भगवद्गीता · दैवासुर सम्पद् विभाग योग

श्लोक 2

दैवासुर सम्पद् विभाग योग · Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

मूल पाठ

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् | दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

अहिंसा, सत्यभाषण; क्रोध न करना; संसारकी कामनाका त्याग; अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना; चुगली न करना; प्राणियोंपर दया करना सांसारिक विषयोंमें न ललचाना; अन्तःकरणकी कोमलता; अकर्तव्य करनेमें लज्जा; चपलताका अभाव।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

अहिंसा, सत्यभाषण; क्रोध न करना; संसारकी कामनाका त्याग; अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना; चुगली न करना; प्राणियोंपर दया करना सांसारिक विषयोंमें न ललचाना; अन्तःकरणकी कोमलता; अकर्तव्य करनेमें लज्जा; चपलताका अभाव।

English Meaning

Harmlessness, truth, absence of anger, renunciation, peacefulness, absence of crookedness, compassion towards beings, non-covetousness, gentleness, modesty, absence of fickleness.

Harmlessness, truth, absence of anger, renunciation, peacefulness, absence of crookedness, compassion towards beings, non-covetousness, gentleness, modesty, absence of fickleness.

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