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श्रीमद्भगवद्गीता · दैवासुर सम्पद् विभाग योग

श्लोक 3

दैवासुर सम्पद् विभाग योग · Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

मूल पाठ

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता | भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

तेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

तेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।

English Meaning

Vigour, forgiveness, fortitude, purity, absence of hatred, absence of pride these belong to the one born for a divine state, O Arjuna.

Vigour, forgiveness, fortitude, purity, absence of hatred, absence of pride these belong to the one born for a divine state, O Arjuna.

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