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श्रीमद्भगवद्गीता · दैवासुर सम्पद् विभाग योग

श्लोक 6

दैवासुर सम्पद् विभाग योग · Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

मूल पाठ

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च | दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

इस लोकमें दो तरहके प्राणियोंकी सृष्टि है -- दैवी और आसुरी। दैवीका तो मैंने विस्तारसे वर्णन कर दिया, अब हे पार्थ ! तुम मेरेसे आसुरीका विस्तार सुनो।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

इस लोकमें दो तरहके प्राणियोंकी सृष्टि है -- दैवी और आसुरी। दैवीका तो मैंने विस्तारसे वर्णन कर दिया, अब हे पार्थ ! तुम मेरेसे आसुरीका विस्तार सुनो।

English Meaning

There are two types of beings in this world, the divine and the demoniacal; the divine has been described at length; hear from Me, O Arjuna, of the demoniacal.

There are two types of beings in this world, the divine and the demoniacal; the divine has been described at length; hear from Me, O Arjuna, of the demoniacal.

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