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श्रीमद्भगवद्गीता · मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 48

मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga

मूल पाठ

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् | सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं।

English Meaning

One should not abandon, O Arjuna, the duty to which one is born, though faulty; for, all undertakings are enveloped by evil, as fire by smoke.

One should not abandon, O Arjuna, the duty to which one is born, though faulty; for, all undertakings are enveloped by evil, as fire by smoke.

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