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श्रीमद्भगवद्गीता · मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 49

मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga

मूल पाठ

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः | नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

English Meaning

He whose intellect is unattached everywhere, who has subdued his self, from whom desire has fled, he by renunciation, attains the supreme state of freedom from action.

He whose intellect is unattached everywhere, who has subdued his self, from whom desire has fled, he by renunciation, attains the supreme state of freedom from action.

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