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श्रीमद्भगवद्गीता · मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 57

मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga

मूल पाठ

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः | बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा।

English Meaning

Mentally renouncing all actions in Me, having Me as the highest goal, resorting to the Yoga of discrimination do thou ever fix thy mind on Me.

Mentally renouncing all actions in Me, having Me as the highest goal, resorting to the Yoga of discrimination do thou ever fix thy mind on Me.

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