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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड चौपाई 14

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती । ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती ॥ जे एहि कथहि सनेह समेता । कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता ॥ होइहहिं राम चरन अनुरागी । कलि मल रहित सुमंगल भागी ॥

Bhaniti mori siva krupan bibhati. Sasi samaja mili manahun surati. Je ehi kathahi saneha sameta. Kahihahin sunihahin samujhi sacheta. Hoihahin rama charana anuragi. Kali mala rahita sumangala bhagi.

अ
हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

मेरी कविता श्रीशिवजीकी कृपासे ऐसी सुशोभित होगी, जैसी तारागणोंके सहित चन्द्रमाके साथ रात्रि शोभित होती है। जो इस कथाको प्रेमसहित एवं सावधानीके साथ समझ-बूझकर कहेंगे-सुनेंगे, वे कलियुगके पापोंसे रहित और सुन्दर कल्याणके भागी होकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंके प्रेमी बन जायँगे॥ ५-६॥

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