वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः। यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥ ६ ॥
Yanmayavashavarti vishvamakhilam brahmadidevasura Yatsattvadamrishaiva bhati sakalam rajjau yathaherbhramah. Yatpadaplavamekameva hi bhavambhodhestatirshavatam Vandeham tamasheshakaranaparam ramakhyamisham harim.
जिनकी मायाके वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर हैं, जिनकी सत्तासे रस्सीमें सर्पके भ्रमकी भाँति यह सारा दृश्य-जगत् सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण ही भवसागरसे तरनेकी इच्छावालोंके लिये एकमात्र नौका हैं, उन समस्त कारणोंसे पर (सब कारणोंके कारण और सबसे श्रेष्ठ) राम कहानेवाले भगवान् हरिकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ६ ॥
यहाँ भगवान हरि (श्रीराम) की वंदना है, जिनकी माया के अधीन ब्रह्मादि देवता, असुर और संपूर्ण विश्व है। उनकी सत्ता से ही यह मिथ्या जगत रस्सी में सर्प के भ्रम की तरह सत्य प्रतीत होता है। भवसागर पार करने वालों के लिए उनके चरण ही एकमात्र नौका हैं।
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