वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥ ३ ॥
Vande bodhamayam nityam gurum shankararupinam. Yamashrito hi vakropi chandrah sarvatra vandyate.
ज्ञानमय, नित्य, शङ्कररूपी गुरुकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होनेसे ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है॥ ३ ॥
यहाँ गुरु को साक्षात् भगवान शिव (शंकर) के रूप में वंदित किया गया है जो नित्य और ज्ञानमय (बोधमय) हैं। दृष्टांत दिया गया है कि शिव का आश्रय प्राप्त कर लेने के कारण ही स्वाभाविक रूप से टेढ़ा (वक्र) चंद्रमा भी हर जगह पूजनीय हो जाता है; उसी प्रकार गुरु की शरण में जाने से दोषयुक्त मनुष्य भी वंदनीय हो जाता है।
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