वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
श्रीरामचरितमानस — बाल काण्ड
कुल 1,913 पद/श्लोक
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥ २ ॥
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥ ३ ॥
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ। वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥ ४ ॥
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥ ५ ॥
यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः। यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥ ६ ॥
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि। स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा- भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति ॥ ७ ॥
सो०—जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन। करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥ १ ॥
मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन। जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन॥ २ ॥
नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन। करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन॥ ३ ॥
कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन। जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन॥ ४ ॥
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ ५ ॥
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥ जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥ दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के । मिटहिं दोष दुख भव रजनी के ॥ सूझहिं राम चरित मनि मानिक । गुपुत प्रगट जहाँ जो जेहि खानिक ॥
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन । नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन ॥ तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन । बरनउँ राम चरित भव मोचन ॥
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना । मोह जनित संसय सब हरना ॥ सुजन समाज सकल गुन खानी । करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी ॥
साधु चरित सुभ चरित कपासू । निरस बिसद गुनमय फल जासू ॥ जो सहि दुख परछिद्र दुरावा । बंदनीय जेहिं जग जस पावा ॥
मुद मंगलमय संत समाजू । जो जग जंगम तीरथराजू ॥ राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा । सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ॥
बिधि निषेधमय कलिमल हरनी । करम कथा रबिनंदनि बरनी ॥ हरि हर कथा बिराजति बेनी । सुनत सकल मुद मंगल देनी ॥
बटु बिस्वास अचल निज धरमा । तीरथराज समाज सुकरमा ॥ सबहि सुलभ सब दिन सब देसा । सेवत सादर समन कलेसा ॥
अकथ अलौकिक तीरथराऊ । देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ ॥
दो०—जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान । कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान ॥ १ ॥
मज्जन फल पेखिअ ततकाला । काक होहिं पिक बकउ मराला ॥ सुनि आचरज करै जनि कोई । सतसंगति महिमा नहिं गोई ॥
बालमीक नारद घटजोनी । निज निज मुखनि कही निज होनी ॥ जलचर थलचर नभचर नाना । जे जड़ चेतन जीव जहाना ॥
मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई ॥ सो जानब सतसंग प्रभाऊ । लोकहुँ बेद न आन उपाऊ ॥
बिनु सतसंग बिबेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥ सतसंगत मुद मंगल मूला । सोइ फल सिधि सब साधन फूला ॥
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधात सुहाई ॥ बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं । फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं ॥
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी । कहत साधु महिमा सकुचानी ॥ सो मो सन कहि जात न कैसें । साक बनिक मनि गुन गन जैसें ॥
दो०—सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग । लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग ॥ २ ॥
संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु। बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु॥ ३ (ख)॥
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥ पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥ जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥
तेज कृसानु रोष महिषेसा । अघ अवगुन धन धनी धनेसा ॥ उदय केत सम हित सब ही के । कुंभकरन सम सोवत नीके ॥
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं । जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं ॥ बंदउँ खल जस सेष सरोषा । सहस बदन बरनइ पर दोषा ॥
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना । पर अघ सुनइ सहस दस काना ॥ बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही । संतत सुरानीक हित जेही ॥
बचन बज्र जेहि सदा पिआरा । सहस नयन पर दोष निहारा ॥
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ। अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥ ३ (क)॥
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा । तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा ॥ बायस पलिअहिं अति अनुरागा । होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा ॥
बंदउँ संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ॥ बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुन देहीं ॥
उपजहिं एक संग जग माहीं । जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं ॥ सुधा सुरा सम साधु असाधू । जनक एक जग जलधि अगाधू ॥
भल अनभल निज निज करतूती । लहत सुजस अपलोक बिभूती ॥ सुधा सुधाकर सुरसरि साधू । गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू ॥ गुन अवगुन जानत सब कोई । जो जेहि भाव नीक तेहि सोई ॥
दो०—उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति । जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति ॥ ४ ॥
खल अघ अगुन साधु गुन गाहा । उभय अपार उदधि अवगाहा ॥ तेहि तें कछु गुन दोष बखाने । संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने ॥
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए । गनि गुन दोष बेद बिलगाए ॥ कहहिं बेद इतिहास पुराना । बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना ॥
दुख सुख पाप पुन्य दिन राती । साधु असाधु सुजाति कुजाती ॥ दानव देव ऊँच अरु नीचू । अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू ॥ माया ब्रह्म जीव जगदीसा । लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा ॥ कासी मग सुरसरि क्रमनासा । मरु मारव महिदेव गवासा ॥ सरग नरक अनुराग बिरागा । निगमागम गुन दोष बिभागा ॥
दो०—भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु। सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥ ५ ॥
अस बिबेक जब देइ बिधाता । तब तजि दोष गुनहिं मनु राता ॥ काल सुभाउ करम बरिआईं । भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं ॥
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं । दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं ॥ खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू । मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू ॥
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ । बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ ॥ उघरहिं अंत न होइ निबाहू । कालनेमि जिमि रावन राहू ॥
किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू । जिमि जग जामवंत हनुमानू ॥ हानि कुसंग सुसंगति लाहू । लोकहुँ बेद बिदित सब काहू ॥
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा । कीचहिं मिलइ नीच जल संगा ॥ साधु असाधु सदन सुक सारीं । सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं ॥
धूम कुसंगति कारिख होई । लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई ॥ सोइ जल अनल अनिल संघाता । होइ जलद जग जीवन दाता ॥
दो०—जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥ ६॥
आकर चारि लाख चौरासी । जाति जीव जल थल नभ बासी ॥ सीय राममय सब जग जानी । करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ॥
जानि कृपाकर किंकर मोहू । सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू ॥ निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं । तातें बिनय करउँ सब पाहीं ॥
करन चहउँ रघुपति गुन गाहा । लघु मति मोरि चरित अवगाहा ॥ सूझ न एकउ अंग उपाऊ । मन मति रंक मनोरथ राऊ ॥
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी । चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी ॥ छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई । सुनिहहिं बालबचन मन लाई ॥
जौं बालक कह तोतरि बाता । सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता ॥ हँसिहहिं क्रूर कुटिल कुबिचारी । जे पर दूषन भूषनधारी ॥
निज कबित्त केहि लाग न नीका । सरस होउ अथवा अति फीका ॥ जे पर भनिति सुनत हरषाहीं । ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं ॥
जग बहु नर सर सरि सम भाई । जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई ॥ सज्जन सकृत सिंधु सम कोई । देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई ॥
खल परिहास होइ हित मोरा । काक कहहिं कलकंठ कठोरा ॥ हंसहि बक दादुर चातकही । हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही ॥
कबित रसिक न राम पद नेहू । तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू ॥ भाषा भनिति भोरि मति मोरी । हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी ॥
प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी । तिन्हहि कथा सुनि लागिहि फीकी ॥ हरि हर पद रति मति न कुतरकी । तिन्ह कहँ मधुर कथा रघुबर की ॥
राम भगति भूषित जियँ जानी । सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी ॥ कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू । सकल कला सब बिद्या हीनू ॥
आखर अरथ अलंकृति नाना । छंद प्रबंध अनेक बिधाना ॥ भाव भेद रस भेद अपारा । कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा ॥
कबित बिबेक एक नहिं मोरें । सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें ॥
दो०—भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास । पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करिहहिं उपहास ॥ ८ ॥
एहि महँ रघुपति नाम उदारा । अति पावन पुरान श्रुति सारा ॥ मंगल भवन अमंगल हारी । उमा सहित जेहि जपत पुरारी ॥
भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ । राम नाम बिनु सोह न सोऊ ॥ बिधुबदनी सब भाँति सँवारी । सोह न बसन बिना बर नारी ॥
सब गुन रहित कुकबि कृत बानी । राम नाम जस अंकित जानी ॥ सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही । मधुकर सरिस संत गुनग्राही ॥
जदपि कबित रस एकउ नाहीं । राम प्रताप प्रगट एहि माहीं ॥ सोइ भरोस मोरें मन आवा । केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा ॥
धूमउ तजइ सहज करुआई । अगरु प्रसंग सुगंध बसाई ॥ भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी । राम कथा जग मंगल करनी ॥
दो०—भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक । सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिबेक ॥ ९ ॥
छं०— मंगल करनि कलिमलहरनि तुलसी कथा रघुनाथ की । गति क्रूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की ॥ प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी । भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी ॥
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी । अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी ॥ नृप किरीट तरुनी तनु पाई । लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥
तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं । उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं ॥ भगति हेतु बिधि भवन बिहाई । सुमिरत सारद आवति धाई ॥
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ । सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ ॥ कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी । गावहिं हरि जस कलि मल हारी ॥
कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना । सिर धुनि गिरा लगत पछिताना ॥ हृदय सिंधु मति सीप समाना । स्वाति सारदा कहहिं सुजाना ॥
जौं बरषइ बर बारि बिचारू । होहिं कबित मुकुतामनि चारू ॥
जे जनमे कलिकाल कराला । करतब बायस बेष मराला ॥ चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े । कपट कलेवर कलि मल भाँड़े ॥
बंचक भगत कहाइ राम के । किंकर कंचन कोह काम के ॥ तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी । धींग धरमध्वज धंधक धोरी ॥
जौं अपने अवगुन सब कहऊँ । बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ ॥ ताते मैं अति अलप बखाने । थोरे महुँ जानिहहिं सयाने ॥
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी । कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी ॥ एतेहु पर करिहहिं जे असंका । मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका ॥
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ । मति अनुरूप राम गुन गावउँ ॥ कहँ रघुपति के चरित अपारा । कहँ मति मोरि निरत संसारा ॥
जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं । कहहु तूल केहि लेखे माहीं ॥ समुझत अमित राम प्रभुताई । करत कथा मन अति कदराई ॥
दो०— जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग । पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग ॥ ११ ॥
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई । तदपि कहें बिनु रहा न कोई ॥ तहाँ बेद अस कारन राखा । भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा ॥
एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानंद पर धामा ॥ ब्यापक बिस्वरुप भगवाना । तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ॥
सो केवल भगतन हित लागी । परम कृपाल प्रनत अनुरागी ॥ जेहि जन पर ममता अति छोहू । जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू ॥
गई बहोर गरीब नेवाजू । सरल सबल साहिब रघुराजू ॥ बुध बरनहिं हरि जस अस जानी । करहिं पुनीत सुफल निज बानी ॥
तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा । कहिहउँ नाइ राम पद माथा ॥ मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई । तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई ॥
दो०—सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान । नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान ॥ १२ ॥
एहि प्रकार बल मनहि देखाई । करिहउँ रघुपति कथा सुहाई ॥ ब्यास आदि कबि पुंगव नाना । जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना ॥
चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे । पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे ॥ कलि के कबिन्ह करउँ परनामा । जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा ॥
जे प्राकृत कबि परम सयाने । भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने ॥ भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें । प्रनवउँ सबहि कपट सब त्यागें ॥
होहु प्रसन्न देहु बरदानू । साधु समाज भनिति सनमानू ॥ जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं । सो श्रम बादि बाल कबि करहीं ॥
कीरति भनिति भूति भलि सोई । सुरसरि सम सब कहँ हित होई ॥ राम सुकीरति भनिति भदेसा । असमंजस अस मोहि अँदेसा ॥
तुम्हरी कृपाँ सुलभ सोउ मोरे । सिअनि सुहावनि टाट पटोरे ॥
दो०—अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं । चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं ॥ १३ ॥
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता । जुगल पुनीत मनोहर चरिता ॥ मज्जन पान पाप हर एका । कहत सुनत एक हर अबिबेका ॥ १ ॥
गुर पितु मातु महेस भवानी । प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी ॥ सेवक स्वामि सखा सिय पी के । हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के ॥ २ ॥
कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा । साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा ॥ अनमिल आखर अरथ न जापू । प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू ॥ ३ ॥
सो उमेस मोहि पर अनुकूला । करिहिं कथा मुद मंगल मूला ॥ सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ । बरनउँ रामचरित चित चाऊ ॥
भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती । ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती ॥ जे एहि कथहि सनेह समेता । कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता ॥ होइहहिं राम चरन अनुरागी । कलि मल रहित सुमंगल भागी ॥
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि । सरजू सरि कलि कलुष नसावनि ॥ प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी । ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी ॥
सिय निंदक अघ ओघ नसाए । लोक बिसोक बनाइ बसाए ॥ बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची । कीरति जासु सकल जग माची ॥
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू । बिस्व सुखद खल कमल तुसारू ॥ दसरथ राउ सहित सब रानी । सुकृत सुमंगल मूरति मानी ॥ करउँ प्रनाम करम मन बानी । करहु कृपा सुत सेवक जानी ॥ जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता । महिमा अवधि राम पितु माता ॥
दो०—सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ । तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ ॥ १५ ॥
सो०—बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद । बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ ॥ १६ ॥
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू । जाहि राम पद गूढ़ सनेहू ॥ जोग भोग महँ राखेउ गोई । राम बिलोकत प्रगटेउ सोई ॥
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना । जासु नेम ब्रत जाइ न बरना ॥ राम चरन पंकज मन जासू । लुबुध मधुप इव तजइ न पासू ॥
बंदउँ लछिमन पद जलजाता । सीतल सुभग भगत सुखदाता ॥ रघुपति कीरति बिमल पताका । दंड समान भयउ जस जाका ॥
सेष सहस्रसीस जग कारन । जो अवतरेउ भूमि भय टारन ॥ सदा सो सानुकूल रह मो पर । कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर ॥
रिपुसूदन पद कमल नमामी । सूर सुसील भरत अनुगामी ॥ महाबीर बिनवउँ हनुमाना । राम जासु जस आप बखाना ॥
सो०—प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन । जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर ॥ १७ ॥
कपिपति रीछ निसाचर राजा । अंगदादि जे कीस समाजा ॥ बंदउँ सब के चरन सुहाए । अधम सरीर राम जिन्ह पाए ॥
रघुपति चरन उपासक जेते । खग मृग सुर नर असुर समेते ॥ बंदउँ पद सरोज सब केरे । जे बिनु काम राम के चेरे ॥
सुक सनकादि भगत मुनि नारद । जे मुनिबर बिग्यान बिसारद ॥ प्रनवउँ सबहि धरनि धरि सीसा । करहु कृपा जन जानि मुनीसा ॥
जनकसुता जग जननि जानकी । अतिसय प्रिय करुनानिधान की ॥ ताके जुग पद कमल मनावउँ । जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ ॥
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक । चरन कमल बंदउँ सब लायक ॥ राजिवनयन धरें धनु सायक । भगत बिपति भंजन सुखदायक ॥
बंदउँ नाम राम रघुबर को । हेतु कृसानु भानु हिमकर को ॥ बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान सो ॥
दो०—गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न । बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न ॥ १८ ॥
महामंत्र जोइ जपत महेसू । कासीं मुकुति हेतु उपदेसू ॥ महिमा जासु जान गनराऊ । प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ ॥
जान आदिकबि नाम प्रतापू । भयउ सुद्ध करि उलटा जापू ॥ सहस नाम सम सुनि सिव बानी । जपि जेईं पिय संग भवानी ॥
हरषे हेतु हेरि हर ही को । किय भूषन तिय भूषन ती को ॥ नाम प्रभाउ जान सिव नीको । कालकूट फलु दीन्ह अमी को ॥
दो० — बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास । राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥ १९ ॥
आखर मधुर मनोहर दोऊ । बरन बिलोचन जन जिय जोऊ ॥ सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू । लोक लाहु परलोक निबाहू ॥
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके । राम लखन सम प्रिय तुलसी के ॥ बरनत बरन प्रीति बिलगाती । ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती ॥
नर नारायन सरिस सुभ्राता । जग पालक बिसेषि जन त्राता ॥ भगति सुतिय कल करन बिभूषन । जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन ॥
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के । कमठ सेष सम धर बसुधा के ॥ जन मन मंजु कंज मधुकर से । जीह जसोमति हरि हलधर से ॥
दो० — एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ । तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ ॥ २० ॥
समुझत सरिस नाम अरु नामी । प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी ॥ नाम रूप दुइ ईस उपाधी । अकथ अनादि सुसामुझि साधी ॥
को बड़ छोट कहत अपराधू । सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू ॥ देखिअहिं रूप नाम आधीना । रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना ॥
रूप बिसेष नाम बिनु जानें । करतल गत न परहिं पहिचानें ॥ सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें । आवत हृदयँ सनेह बिसेषें ॥
नाम रूप गति अकथ कहानी । समुझत सुखद न परति बखानी ॥ अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी । उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी ॥
दो० — राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार । तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ॥ २१ ॥
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी । बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी ॥ ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा । अकथ अनामय नाम न रूपा ॥
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ । नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ ॥ साधक नाम जपहिं लय लाएँ । होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ ॥
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा । अकथ अगाध अनादि अनूपा ॥ मोरें मत बड़ नामु दुहू तें । किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें ॥
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी । सकल जीव जग दीन दुखारी ॥ नाम निरूपन नाम जतन तें । सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें ॥
प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की । कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की ॥ एकु दारुगत देखिअ एकू । पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू ॥ उभय अगम जुग सुगम नाम तें । कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें ॥ ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी । सत चेतन घन आनँद रासी ॥
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ । राखे सरन जान सबु कोऊ ॥ नाम गरीब अनेक नेवाजे । लोक बेद बर बिरिद बिराजे ॥
राम भालु कपि कटकु बटोरा । सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा ॥ नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं । करहु बिचारु सुजन मन माहीं ॥
राम सकुल रन रावनु मारा । सीय सहित निज पुर पगु धारा ॥ राजा रामु अवध रजधानी । गावत गुन सुर मुनि बर बानी ॥
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती । बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती ॥ फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें । नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें ॥
नाम प्रसाद संभु अबिनासी । साजु अमंगल मंगल रासी ॥ सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी । नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी ॥
नारद जानेउ नाम प्रतापू । जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू ॥ नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू । भगत सिरोमनि भे प्रहलादू ॥
ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ । पायउ अचल अनूपम ठाऊँ ॥ सुमिरि पवनसुत पावन नामू । अपने बस करि राखे रामू ॥
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ । भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ ॥ कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई । रामु न सकहिं नाम गुन गाई ॥
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका । भए नाम जपि जीव बिसोका ॥ बेद पुरान संत मत एहू । सकल सुकृत फल राम सनेहू ॥
ध्यानु प्रथम जुग मख बिधि दूजें । द्वापर परितोषत प्रभु पूजें ॥ कलि केवल मल मूल मलीना । पाप पयोनिधि जन मन मीना ॥
नाम कामतरु काल कराला । सुमिरत समन सकल जग जाला ॥ राम नाम कलि अभिमत दाता । हित परलोक लोक पितु माता ॥
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू । राम नाम अवलंबन एकू ॥ कालनेमि कलि कपट निधानू । नाम सुमति समरथ हनुमानू ॥
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ । नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ॥ सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा । करउँ नाइ रघुनाथहि माथा ॥
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती । जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती ॥ राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो । निज दिसि देखि दयानिधि पोसो ॥
लोकहुँ बेद सुसाहिब रीती । बिनय सुनत पहिचानत प्रीती ॥ गनी गरीब ग्राम नर नागर । पंडित मूढ़ मलीन उजागर ॥
सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी । नृपहि सराहत सब नर नारी ॥ साधु सुजान सुसील नृपाला । ईस अंस भव परम कृपाला ॥
सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी । भनिति भगति नति गति पहिचानी ॥ यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ । जान सिरोमनि कोसलराऊ ॥
रीझत राम सनेह निसोतें । को जग मंद मलिनमति मोतें ॥
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी । सुनि अघ नरकहूँ नाक सकोरी ॥ समुझि सहम मोहि अपडर अपनेँ । सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनेँ ॥
सुनि अवलोकि सुचित चख चाही । भगति मोरि मति स्वामि सराही ॥ कहत नसाइ होइ हियँ नीकी । रीझत राम जानि जन जी की ॥
रहति न प्रभु चित चूक किए की । करत सुरति सय बार हिए की ॥ जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली । फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली ॥
सोइ करतूति बिभीषन केरी । सपनेहूँ सो न राम हियँ हेरी ॥ ते भरतहि भेंटत सनमाने । राजसभाँ रघुबीर बखाने ॥
सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु । उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु ॥
हौंहूँ कहावत सबु कहत राम सहत उपहास । साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास ॥
जागबलिक जो कथा सुहाई । भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई ॥ कहिहउँ सोइ संवाद बखानी । सुनहु सकल सज्जन सुखु मानी ॥
संभु कीन्ह यह चरित सुहावा । बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा ॥ सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा । राम भगत अधिकारी चीन्हा ॥
तेहि सन जागबलिक पुनि पावा । तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा ॥ ते श्रोता बकता समसीला । सबदरसी जानहिं हरिलीला ॥
जानहिं तीनि काल निज ग्याना । करतल गत आमलक समाना ॥ औरउ जे हरिभगत सुजाना । कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना ॥
राम निकाई रावरी है सबही को नीक । जौं यह साँची है सदा तो नीको तुलसीक ॥
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान । तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान ॥
एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिर नाइ । बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ ॥
तदपि कही गुर बारहिं बारा । समुझि परी कछु मति अनुसारा ॥ भाषाबद्ध करबि मैं सोई । मोरें मन प्रबोध जेहि होई ॥
जस कछु बुधि बिबेक बल मेरे । तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें ॥ निज संदेह मोह भ्रम हरनी । करउँ कथा भव सरिता तरनी ॥
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि । रामकथा कलि कलुष बिभंजनि ॥ रामकथा कलि पन्नग भरनी । पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी ॥
रामकथा कलि कामद गाई । सुजन सजीवनि मूरि सुहाई ॥ सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि । भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि ॥
असुर सेन सम नरक निकंदिनि । साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि ॥ संत समाज पयोधि रमा सी । बिस्व भार भर अचल छमा सी ॥
जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी । जीवन मुकुति हेतु जनु कासी ॥ रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी । तुलसीदास हित हियँ हुलसी सी ॥
सिवप्रिय मेकल सैल सुता सी । सकल सिद्धि सुख संपति रासी ॥ सदगुन सुरगन अंब अदिति सी । रघुबर भगति प्रेम परिमिति सी ॥
श्रोता बकता ज्ञाननिधि कथा राम कै गूढ़ । किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़ ॥
मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत । समुझी नहीं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत ॥
रामचरित चिंतामनि चारु । संत सुमति तिय सुभग सिंगारु ॥ जग मंगल गुनग्राम राम के । दानि मुकुति धन धरम धाम के ॥
सदगुर ग्यान बिराग जोग के । बिबुध बैद भव भीम रोग के ॥ जननि जनक सिय राम प्रेम के । बीज सकल ब्रत धरम नेम के ॥
समन पाप संताप सोक के । प्रिय पालक परलोक लोक के ॥ सचिव सुभट भूपति बिचार के । कुंभज लोभ उदधि अपार के ॥
काम कोह कलिमल करिगन के । केहरि सावक जन मन बन के ॥ अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद घन दारिद दवारि के ॥
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥ हरन मोह तम दिनकर कर से । सेवक सालि पाल जलधर से ॥
अभिमत दानि देवतरु बर से । सेवत सुलभ सुखद हरि हर से ॥ सुकबि सरद नभ मन उडगन से । रामभगत जन जीवन धन से ॥
सकल सुकृत फल भूरि भोग से । जग हित निरुपधि साधु लोग से ॥ सेवक मन मानस मराल से । पावन गंग तरंग माल से ॥
रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु । तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु ॥
कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी । जेहि बिधि संकर कहा बखानी ॥ सो सब हेतु कहब मैं गाई । कथा प्रबंध बिचित्र बनाई ॥
जेहि यह कथा सुनी नहिं होई । जनि आचरजु करे सुनि सोई ॥ कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी । नहिं आचरजु करहिं अस जानी ॥
रामकथा के मिति जग नाहीं । असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं ॥ नाना भाँति राम अवतारा । रामायन सत कोटि अपारा ॥
कल्पभेद हरिचरित सुहाए । भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए ॥ करिअ न संसय अस उर आनी । सुनिअ कथा सादर रति मानी ॥
कुपथ कुतर्क कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड । दहन राम गुन ग्राम जिमि ईंधन अनल प्रचंड ॥
रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहू । सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहू ॥
एहि बिधि सब संसय करि दूरी । सिर धरि गुर पद पंकज धूरी ॥ पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी । करत कथा जेहिं लाग न खोरी ॥
सादर सिवहि नाइ अब माथा । बरनउँ बिसद राम गुन गाथा ॥ संवत सोरह सै एकतीसा । करउँ कथा हरि पद धरि सीसा ॥
नौमी भौम बार मधुमासा । अवधपुरीं यह चरित प्रकासा ॥ जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं । तीरथ सकल तहँ चलि आवहिं ॥
असुर नाग खग नर मुनि देवा । आइ करहिं रघुनायक सेवा ॥ जनम महोत्सव रचहिं सुजाना । करहिं राम कल कीरति गाना ॥
राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार । सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह के बिमल बिचार ॥
दरस परस मज्जन अरु पाना । हरइ पाप कह बेद पुराना ॥ नदी पुनीत अमित महिमा अति । कहि न सकइ सारदा बिमल मति ॥
राम धामदा पुरी सुहावनि । लोक समस्त बिदित अति पावनि ॥ चारि खानि जग जीव अपारा । अवध तजें तनु नहिं संसारा ॥
सब बिधि पुरी मनोहर जानी । सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी ॥ बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा । सुनत नसाहिं काम मद दंभा ॥
रामचरितमानस एहि नामा । सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा ॥ मन करि बिषय अनल बन जरई । होइ सुखी जौं एहि सर परई ॥
रामचरितमानस मुनि भावन । बिरचेउ संभु सुहावन पावन ॥ त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन । कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन ॥
रचि महेस निज मानस राखा । पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा ॥ तातें रामचरितमानस बर । धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर ॥
कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई । सादर सुनहु सुजन मन लाई ॥
मज्जहिं सज्जन बूंद बहु पावन सरजू नीर । जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर ॥
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी । रामचरितमानस कवि तुलसी ॥ करउँ मनोहर मति अनुहारी । सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी ॥
सुमति भूमि थल हृदय अगाधू । बेद पुरान उदधि घन साधू ॥ बरषहिं राम सुजस बर बारी । मधुर मनोहर मंगलकारी ॥
लीला सगुन जो कहहिं बखानी । सोइ स्वच्छता करइ मल हानी ॥ प्रेम भगति जो बरनि न जाई । सोइ मधुरता सुसीतलताई ॥
सो जल सुकृत सालि हित होई । राम भगत जन जीवन सोई ॥
मेधा महि गत सो जल पावन । सकलि श्रवन मग चलेउ सुहावन ॥ भरेउ सुमानस सुथल थिराना । सुखद सीत रुचि चारु चिराना ॥
जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु । अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु ॥
सम प्रबंध सुभग सोपाना । ग्यान नयन निरखत मन माना ॥ रघुपति महिमा अगुन अबाधा । बरनब सोइ बर बारि अगाधा ॥
राम सीय जस सलिल सुधासम । उपमा बीचि बिलास मनोरम ॥ पुरइनि सघन चारु चौपाई । जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई ॥
छंद सोरठा सुंदर दोहा । सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा ॥ अरथ अनूप सुभाव सुभाषा । सोइ पराग मकरंद सुवासा ॥
सुकृत पुंज मंजुल अलि माला । ग्यान बिराग बिचार मराला ॥ धुनि अवरेब कवित गुन जाती । मीन मनोहर ते बहुभाँती ॥
अरथ धरम कामादिक चारी । कहब ग्यान बिग्यान बिचारी ॥ नव रस जप तप जोग बिरागा । ते सब जलचर चारु तड़ागा ॥
सुकृती साधु नाम गुन गाना । ते बिचित्र जलबिहग समाना ॥ संतसभा चहुँ दिसि अवराईं । श्रद्धा रितु बसंत सम गाई ॥
भगति निरूपन बिबिध बिधाना । छमा दया दम लता बिताना ॥ सम जम नियम फूल फल ग्याना । हरि पद रति रस बेद बखाना ॥
औरउ कथा अनेक प्रसंगा । तेइ सुक पिक बहुरंग बिहंगा ॥
सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि । तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि ॥
जे गावहिं यह चरित सँभारे । तेइ एहि ताल चतुर रखवारे ॥ सदा सुनहिं सादर नर नारी । तेइ सुरवर मानस अधिकारी ॥
अति खल जे बिषई बग कागा । एहि सर निकट न जाहिं अभागा ॥ संबुक भेक सेवार समाना । इहाँ न बिषय कथा रस नाना ॥
तेहि कारण आवत हियँ हारे । कामी काक बलाक बिचारे ॥ आवत एहि सर अति कठिनाई । राम कृपा बिनु आइ न जाई ॥
कठिन कुसंग कुपंथ कराला । तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला ॥ गृह कारज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥
बन बहु बिषम मोह मद माना । नदीं कुतर्क भयंकर नाना ॥
पुलक वाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु । माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु ॥
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोइ । जातहिं नींद जुड़ाई होइ ॥ जड़ता जाइ बिषम उर लागा । गइउँ न मज्जन पाव अभागा ॥
करि न जाइ सर मज्जन पाना । फिरि आवइ समेत अभिमाना ॥ जौं बहोरि कोउ पूछन आवा । सर निंदा करि ताहि बुझावा ॥
सकल बिघ्न ब्यापहिं नहिं तेही । राम सुकृपा बिलोकहिं जेही ॥ सोइ सादर सर मज्जनु करई । महा घोर त्रयताप न जरई ॥
ते नर यह सर तजहिं न काऊ । जिन्ह कें राम चरन भल भाऊ ॥ जो नहाइ चह एहि सर भाई । सो सतसंग करउ मन लाई ॥
अस मानस मानस चख चाही । भई कबि बुद्धि बिमल अवगाही ॥ भयउ हृदयँ आनंद उछाहू । उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रवाहू ॥
चली सुभग कविता सरिता सो । राम बिमल जस जल भरिता सो ॥ सरजू नाम सुमंगल मूला । लोक बेद मत मंजुल कूला ॥
नदी पुनीत सुमानस नंदिनि । कलिमल तुन तरु मूल निकंदिनि ॥
जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ । तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ ॥
रामभगति सुरसरितहि जाई । मिली सुकीरति सरजू सुहाई ॥ सानुज राम समर जसु पावन । मिलेउ महानदु सोन सुहावन ॥
जुग बिच भगति देवधुनि धारा । सोहति सहित सुबिरति बिचारा ॥ त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी । राम सरूप सिंधु समुहानी ॥
मानस मूल मिली सुरसरिही । सुनत सुजन मन पावन करिही ॥ बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा । जनु सरि तीर तीर बन बागा ॥
उमा महेस बिबाह बराती । ते जलचर अगनित बहुभाँती ॥ रघुबर जनम आनंद बधाई । भँवर तरंग मनोहरताई ॥
श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूला । संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूला ॥
सीय स्वयंबर कथा सुहाई । सरित सुहावनि सो छबि छाई ॥ नदी नाव पटु प्रस्न अनेका । केवट कुसल उत्तर सबिबेका ॥
सुनि अनुकथन परस्पर होई । पथिक समाज सोह सरि सोई ॥ घोर धार भृगुनाथ रिसानी । घाट सुबद्ध राम बर बानी ॥
सानुज राम बिबाह उछाहू । सो सुभ उमग सुखद सब काहू ॥ कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं । ते सुकृती मन मुदित नहाहीं ॥
राम तिलक हित मंगल साजा । परब जोग जनु जुरे समाजा ॥ काइ कुमति केकई केरी । परी जासु फल बिपति घनेरी ॥
बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग । नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारि बिहंग ॥
कीरति सरित छहुँ रितु रूरी । समय सुहावनि पावनि भूरी ॥ हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू । सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू ॥
बरनब राम बिबाह समाजू । सो मुद मंगलमय रितुराजू ॥ ग्रीषम दुसह राम बनगवनू । पंथकथा खर आतप पवनू ॥
बरषा घोर निसाचर रारी । सुरकुल सालि सुमंगलकारी ॥ राम राज सुख बिनय बड़ाई । बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई ॥
सती सिरोमनि सिय गुन गाथा । सोइ गुन अमल अनूपम पाथा ॥ भरत सुभाउ सुसीतलताई । सदा एकरस बरनि न जाई ॥
समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग । कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग ॥
आरति बिनय दीनता मोरी । लघुता ललित सुबारि न थोरी ॥ अदभुत सलिल सुनत गुनकारी । आस पिआस मनोमल हारी ॥
राम सुप्रेमहि पोषत पानी । हरत सकल कलि कलुष गलानी ॥ भव श्रम सोषक तोषक तोषा । समन दुरित दुख दारिद दोषा ॥
काम कोह मद मोह नसावन । बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन ॥ सादर मज्जन पान किए तें । मिटहिं पाप परिताप हिए तें ॥
जिन्ह एहि बारि न मानस धोए । ते कायर कलिकाल बिगोए ॥ तृषित निरखि रवि कर भव बारी । फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी ॥
अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परस्पर हास । भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास ॥
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा । तिन्हहि राम पद अति अनुरागा ॥ तापस सम दम दया निधाना । परमारथ पथ परम सुजाना ॥
माघ मकरगत रबि जब होई । तीरथपतिहिं आव सब कोई ॥ देव दनुज किंनर नर श्रेनी । सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनी ॥
पूजहिं माधव पद जलजाता । परसि अक्षयवट हरषहिं गाता ॥ भरद्वाज आश्रम अति पावन । परम रम्य मुनिबर मन भावन ॥
तहाँ होइ मुनि ऋषय समाजा । जाहिं जे मज्जन तीरथराजा ॥ मज्जहिं प्रात समेत उछाहा । कहहिं परस्पर हरि गुन गाहा ॥
अब रघुपति पद पंकजरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद । कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद ॥
मति अनुहारि सुवारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ । सुमिरि भवानी संकरहि कह कवि कथा सुहाइ ॥
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं । पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं ॥ प्रति संबत अति होइ अनंदा । मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा ॥
एक बार भरि मकर नहाए । सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए ॥ जागबलिक मुनि परम बिबेकी । भरद्वाज राखे पद टेकी ॥
सादर चरन सरोज पखारे । अति पुनीत आसन बैठारे ॥ करि पूजा मुनि सुजसु बखानी । बोले अति पुनीत मृदु बानी ॥
नाथ एक संसउ बड़ मोरें । करगत बेदतत्त्व सब तोरें ॥ कहत सो मोहि लागत भय लाजा । जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा ॥
ब्रह्म निरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्त्व विभाग । कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग ॥ ४४ ॥
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू । हरहु नाथ करि जन पर छोहू ॥ राम नाम कर अमित प्रभावा । संत पुरान उपनिषद गावा ॥
संतत जपत संभु अबिनासी । सिव भगवान ग्यान गुन रासी ॥ आकर चारि जीव जग अहहीं । कासीं मरत परम पद लहहीं ॥
सोपि राम महिमा मुनिराया । सिव उपदेसु करत करि दाया ॥ राम कवन प्रभु पूछउँ तोही । कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही ॥
एक राम अवधेस कुमारा । तिन्ह कर चरित बिदित संसारा ॥ नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा । भयउ रोषु रन रावनु मारा ॥
संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव । होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव ॥ ४५ ॥
जैसें मिटे मोर भ्रम भारी । कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी ॥ जागबलिक बोले मुसुकाई । तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई ॥
रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी । चतुराई तुम्हारि मैं जानी ॥ चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा । कीन्हहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा ॥
तात सुनहु सादर मनु लाई । कहउँ राम कै कथा सुहाई ॥ महामोहु महिषेसु बिसाला । रामकथा कालिका कराला ॥
रामकथा ससि किरन समाना । संत चकोर करहिं जेहि पाना ॥ ऐसइ संसय कीन्ह भवानी । महादेव तब कहा बखानी ॥
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि । सत्यधाम सर्वज्ञ तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि ॥ ४६ ॥
एक बार त्रेता जुग माहीं । संभु गए कुंभज ऋषि पाहीं ॥ संग सती जगजननि भवानी । पूजे ऋषि अखिलेस्वर जानी ॥
रामकथा मुनिबर्ज बखानी । सुनी महेस परम सुखु मानी ॥ ऋषि पूछी हरिभगति सुहाई । कही संभु अधिकारी पाई ॥
कहत सुनत रघुपति गुन गाथा । कछु दिन तहँ रहे गिरिनाथा ॥ मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी । चले भवन संग दच्छकुमारी ॥
तेहि अवसर भंजन महिभारा । हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा ॥ पिता बचन तजि राजु उदासी । दंडक बन बिचरत अबिनासी ॥
कहउँ सो मति अनुहारी अब उमा संभु संबाद । भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद ॥ ४७ ॥
संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ । तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची ॥ ४८ (ख) ॥
रावन मरन मनुज कर जाचा । प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा ॥ जौं नहिं जाउँ रहउ पछितावा । करत बिचारु न बनत बनावा ॥
एहि बिधि भए सोचबस ईसा । तेहि समय जाइ दससीसा ॥ लीन्ह नीच मारीचहि संगा । भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा ॥
करि छलु मूढ़ हरी बैदेही । प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही ॥ मृग बधि बंधु सहित हरि आए । आश्रमु देखि नयन जल छाए ॥
बिरह बिकल नर इव रघुराई । खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई ॥ कबहूँ जोग बियोग न जाकें । देखा प्रगट बिरह दुखु ताकें ॥
हृदयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ । गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ ॥ ४८ (क) ॥
संभु समय तेहि रामहि देखा । उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा ॥ भरि लोचन छबिसिंधु निहारी । कुसमय जानि न कीन्ह चिहारी ॥
जय सच्चिदानंद जग पावन । अस कहि चलेउ मनोज नसावन ॥ चले जात सिव सती समेताँ । पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता ॥
सतीं सो दसा संभु कै देखी । उर उपजा संदेहु बिसेषी ॥ संकर जगतबंद्य जगदीसा । सुर नर मुनि सब नावत सीसा ॥
तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा । कहि सच्चिदानंद परधामा ॥ भए मगन छबि तासु बिलोकी । अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी ॥
अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान । जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन ॥ ४९ ॥
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी । सोउ सर्वज्ञ जथा त्रिपुरारी ॥ खोजइ सो कि अग्य इव नारी । ग्यानधाम श्रीपति असुरारी ॥
संभुगिरा पुनि मृषा न होई । सिव सर्वज्ञ जान सबु कोई ॥ अस संसय मन भयउ अपारा । होइ न हृदयँ प्रबोध प्रचारा ॥
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी । हर अंतरजामी सब जानी ॥ सुनहि सती तव नारि सुभाऊ । संसय अस न धरिअ उर काऊ ॥
जासु कथा कुंभज ऋषि गाई । भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई ॥ सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा । सेवत जाहि सदा मुनि धीरा ॥
ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद । सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद ॥ ५० ॥
मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं । कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं ॥ सोइ रामु व्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी । अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनी ॥
लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवँ बार बहुँ । बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ ॥ ५१ ॥
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू । तौ किन जाइ परीक्षा लेहू ॥ तब लगि बैठ अहउँ बटछाहीं । जब लगि तुम्ह एहि मोहिं पाहीं ॥
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी । करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी ॥ चलीं सती सिव आयसु पाई । करहिं बिचार करौं का भाई ॥
इहाँ संभु अस मन अनुमाना । दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना ॥ मोरेहुँ कहें न संसय जाहीं । बिधि बिपरीत भलाई नाहीं ॥
होइहि सोइ जो राम रचि राखा । को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥ अस कहि लगे जपन हरिनामा । गई सती जहँ प्रभु सुखधामा ॥
लछिमन दीख उमाकृत बेषा । चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा ॥ कहि न सकत कछु अति गंभीरा । प्रभु प्रभाव जानत मतिधीरा ॥
सती कपटु जानेउ सुरस्वामी । सबदरसी सब अंतरजामी ॥ सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना । सोइ सरबग्य रामु भगवाना ॥
सतीं कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊँ । देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ ॥ निज माया बलु हृदयँ बखानी । बोले बिहसि रामु मृदु बानी ॥
पुनि पुनि हृदयँ बिचारु करि धरि सीता कर रूप । आगें होइ चलि पंथ तेहिं जेहिं आवत नरभूप ॥ ५२ ॥
मैं संकर कर कहा न माना । निज अग्यानु राम पर आना ॥ जाइ उतरु अब देहउँ काहा । उर उपजा अति दारुन दाहा ॥
जाना राम सतीं दुखु पावा । निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा ॥ सतीं दीख कौतुकु मग जाता । आगें रामु सहित श्री भ्राता ॥
फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा । सहित बंधु सिय सुंदर बेषा ॥ जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना । सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना ॥
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका । अमित प्रभाउ एक तें एका ॥ बंदत चरन करत प्रभु सेवा । बिविध बेष देखे सब देवा ॥
राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु । सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु ॥ ५३ ॥
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते । सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते ॥ जीव चराचर जो संसारा । देखे सकल अनेक प्रकारा ॥
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा । राम रूप दूसर नहिं देखा ॥ अवलोके रघुपति बहुतेरे । सीता सहित न बेष घनेरे ॥
सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता । देखि सती अति भईं सभीता ॥ हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं । नयन मूदि बैठीं मग माहीं ॥
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी । कछु न दीख तहाँ दच्छकुमारी ॥ पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा । चलीं तहँ जहाँ रहे गिरीसा ॥
सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप । जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तनु अनुरूप ॥ ५४ ॥
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ । भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ ॥ कछु न परीक्षा लीन्हि गोसाईं । कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाईं ॥
जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई । मोरें मन प्रतीति अति सोई ॥ तब संकर देखेउ धरि ध्याना । सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना ॥
बहुरि राममायहि सिरु नावा । प्रेरि सतिहि जेहिं झूठ कहावा ॥ हरि इच्छा भावी बलवाना । हृदयँ बिचारत संभु सुजाना ॥
सतीं कीन्ह सीता कर बेषा । सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा ॥ जौं अब करउँ सती सन प्रीती । मिटइ भगति पथु होइ अनीती ॥
गई समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात । लीन्हि परीक्षा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात ॥ ५५ ॥
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा । सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा ॥ एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं । सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं ॥
अस बिचारि संकर मतिधीरा । चले भवन सुमिरत रघुबीरा ॥ चलत गगन भै गिरा सुहाई । जय महेस भलि भगति दृढ़ाई ॥
अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना । रामभगत समर्थ भगवाना ॥ सुनि नभगिरा सती उर सोचा । पूछा सिवहि समेत सकोचा ॥
कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला । सत्यधाम प्रभु दीनदयाला ॥ जदपि सतीं पूछा बहु भाँती । तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती ॥
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु । प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु ॥ ५६ ॥
जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि । बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि ॥ ५७ (ख) ॥
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी । चिंता अमित जाइ नहिं बरनी ॥ कृपासिंधु सिव परम अगाधा । प्रगट न कहेउ मोर अपराधा ॥
संकर रुख अवलोकि भवानी । प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी ॥ निज अघ समुझि न कछु कहि जाई । तपइ अवाँ इव उर अधिकाई ॥
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू । कहीं कथा सुंदर सुखहेतू ॥ बरनत पंथ बिबिध इतिहासा । बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा ॥
तहाँ पुनि संभु समुझि पन आपन । बैठे बटतर करि कमलासन ॥ संकर सहज सरूपु सम्हारा । लागि समाधि अखंड अपारा ॥
सतीं हृदयँ अनुमान किया सबु जानेउ सर्वज्ञ । कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य ॥ ५७ (क) ॥
नित नव सोचु सती उर भारा । कब जैहउँ दुख सागर पारा ॥ मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना । पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना ॥
सो फल मोहि बिधाताँ दीन्हा । जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा ॥ अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही । संकर बिमुख जिआवसि मोही ॥
कहि न जाइ कछु हृदय गलानी । मन महुँ रामहि सुमिर सयानी ॥ जौं प्रभु दीनदयालु कहावा । आरति हरन बेद जसु गावा ॥
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी । छूटउ बेगि देह यह मोरी ॥ जौं मोरें सिव चरन सनेहू । मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू ॥
सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं । मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं ॥ ५८ ॥
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी । अकथनीय दारुन दुख भारी ॥ बीतें संबत सहस सतासी । तजी समाधि संभु अबिनासी ॥
राम नाम सिव सुमिरन लागे । जानेउ सतीं जगतपति जागे ॥ जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा । सनमुख संकर आसनु दीन्हा ॥
लगे कहन हरिकथा रसाला । दच्छ प्रजेस भए तेहि काला ॥ देखा बिधि बिचारि सब लायक । दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक ॥
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा । अति अभिमानु हृदयँ तब आवा ॥ नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं । प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥
तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ । होइ मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ ॥ ५९ ॥
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा । बधुन्ह समेत चले सुर सर्वा ॥ बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई । चले सकल सुर जान बनाई ॥
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना । जात चले सुंदर बिधि नाना ॥ सुर सुंदरी करहिं कल गाना । सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना ॥
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी । पिता जग्य सुनि कछु हरषानी ॥ जौं महेसु मोहि आयसु देहीं । कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं ॥
दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग । नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग ॥ ६० ॥
कहेहु नीक मोरेंहुँ मन भावा । यह अनुचित नहिं नेवत पठावा ॥ दच्छ सकल निज सुता बोलाईं । हमरें बयर तुम्हउ बिसराईं ॥
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना । तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना ॥ जौं बिनु बोलें जाहु भवानी । रहइ न सीलु सनेहु न कानी ॥
जद्यपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा । जाइअ बिनु बोलेंहुँ न संदेहा ॥ तदपि बिरोध मान जहाँ कोई । तहाँ गएँ कल्यानु न होई ॥
भाँति अनेक संभु समुझावा । भावी बस न ग्यानु उर आवा ॥ कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ । नहिं भलि बात हमारे भाएँ ॥
पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ । तौ मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ ॥ ६१ ॥
पिता भवन जब गई भवानी । दच्छ त्रास काहूँ न सनमानी ॥ सादर भलेहिं मिली एक माता । भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता ॥
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता । सतिहि बिलोकि जरे सब गाता ॥ सतीं जाइ देखेउ तब जागा । कतहूँ न दीख संभु कर भागा ॥
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ । प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ ॥ पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा । जस यह भयउ महा परितापा ॥
जद्यपि जग दारुन दुख नाना । सब तें कठिन जाति अवमाना ॥ समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा । बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा ॥
कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि । दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि ॥ ६२ ॥
सुनहु सभासद सकल मुनींदा । कही सुनी जिन्ह संकर निंदा ॥ सो फल तुरत लहब सब काहूँ । भली भाँति पछिताब पिताहूँ ॥
संत संभु श्रीपति अपबादा । सुनिअ जहाँ तहाँ असि मरजादा ॥ काटिअ तासु जीभ जो बसाई । श्रवन मूदि न त चलिअ पराई ॥
जगदातमा महेसु पुरारी । जगत जनक सब के हितकारी ॥ पिता मंदमति निंदत तेही । दच्छ सुक्र संभव यह देही ॥
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतु । उर धरि चंदमौलि वृषकेतू ॥ अस कहि जोग अगिनि तनु जारा । भयउ सकल मख हाहाकारा ॥
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोधा । सकल सभहि हटकि तब बोलीं बचन सकोधा ॥ ६३ ॥
समाचार सब संकर पाए । बीरभद्र करि कोप पठाए ॥ जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा । सकल सुरन्ह बिधिवत फल दीन्हा ॥
भै जगबिदित दच्छ गति सोई । जसि कछु संभु बिमुख के होई ॥ यह इतिहास सकल जग जानी । ताते मैं संछेप बखानी ॥
सती मरत हरि सन बर मागा । जनम जनम सिव पद अनुरागा ॥ तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई । जनमीं पारबती तनु पाई ॥
जब तें उमा सैल गृह जाई । सकल सिद्धि संपति तहँ छाई ॥ जँह तँह मुनि सु आश्रम कीन्हे । उचित बास हिम भूधर दीन्हे ॥
सती मरत सुनि संभु गन लगे करन मख खीस । जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्ह मुनीस ॥ ६४ ॥
सरिता सब पुनीत जलु बहहीं । खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं ॥ सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा । गिरि पर सकल करहिं अनुरागा ॥
सोह सैल गिरिजा गृह आएँ । जिमि जनु रामभगति के पाएँ ॥ नित नूतन मंगल गृह तासू । ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू ॥
नारद समाचार सब पाए । कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए ॥ सैलराज बड़ आदर कीन्हा । पद पखारि बर आसन दीन्हा ॥
नारि सहित मुनि पद सिरु नावा । चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा ॥ निज सोभाग्य बहुत गिरि बरना । सुता बोलि मेली मुनि चरना ॥
सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति । प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति ॥ ६५ ॥
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी । सुता तुम्हारि सकल गुन खानी ॥ सुंदर सहज सुसील सयानी । नाम उमा अंबिका भवानी ॥
सब लच्छन संपन्न कुमारी । होइहि संतत पियहि पिआरी ॥ सदा अचल एहि कर अहिवाता । एहि तें जसु पैहहिं पितु माता ॥
होइहि पूज्य सकल जग माहीं । एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं ॥ एहि कर नामु सुमिरि संसारा । त्रिय चढ़िहहिं पतिब्रत असिधारा ॥
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी । सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी ॥ अगुन अमान मातु पितु हीना । उदासीन सब संसय छीना ॥
त्रिकालज्ञ सर्वज्ञ तुम्ह गति सर्वत्र तुम्हारी । कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारी ॥ ६६ ॥
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी । दुख दंपतिहि उमा हरषानी ॥ नारदहूँ यह भेद न जाना । दसा एक समुझब बिलगाना ॥
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना । पुलक सरीर भरे जल नैना ॥ होइ न मूषा देवरिषि भाषा । उमा सो बचन हृदयँ धरि राखा ॥
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू । मिलन कठिन मन भा संदेहू ॥ जानि कुअवसर प्रीति दुराई । सखी उछंग बैठी पुनि जाई ॥
झूठि न होइ देवरिषि बानी । सोचहिं दंपति सखीं सयानी ॥ उर धरि धीर कहहु गिरिराऊ । कहहु नाथ का करिअ उपाऊ ॥
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष । अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेष ॥ ६७ ॥
तदपि एक मैं कहउँ उपाई । होइ करै जौं दैउ सहाई ॥ जस बर मैं बरनेउ तुम्ह पाहीं । मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं ॥
जे जे बर के दोष बखाने । ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने ॥ जौं बिबाहु संकर सन होई । दोषउ गुन सम कह सबु कोई ॥
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं । बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं ॥ भानु कृसानु सर्व रस खाहीं । तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं ॥
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई । सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई ॥ समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं । रबि पावक सुरसरि की नाईं ॥
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार । देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार ॥ ६८ ॥
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना । कबहुँ न संत करहिं तेंहि पाना ॥ सुरसरि मिलें सो पावन जैसेँ । ईस अनीसहि अंतर तैसें ॥
संभु सहज समरथ भगवाना । एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना ॥ दुराराध्य पै अहहिं महेसू । आसुतोष पुनि किएँ कलेसू ॥
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी । भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी ॥ जद्यपि बर अनेक जग माहीं । एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं ॥
बर दायक प्रनतारति भंजन । कृपासिंधु सेवक मन रंजन ॥ इच्छित फल बिनु सिव अवराधें । लहिअ न कोटि जोग जप साधें ॥
जौं अस हठ करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान । परहिं कल्प भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान ॥ ६९ ॥
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गएऊ । आगिल चरित सुनहु जस भएऊ ॥ पतिहि एकांत पाइ कह मैना । नाथ न मैं समुझे मुनि बैना ॥
जौं घरु बरु कुलु होइ अनुपा । करिअ बिबाहु सुता अनरूपा ॥ न त कन्या बरु रहउ कुआरी । कंत उमा मम प्रानपिआरी ॥
जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू । गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू ॥ सोइ बिचारि पति करिहु बिबाहू । जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू ॥
अस कहि परी चरन धरि सीसा । बोले सहित सनेह गिरीसा ॥ बरु पावक प्रगटे ससि माहीं । नारद बचनु अन्यथा नाहीं ॥
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस । होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस ॥ ७० ॥
अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू । तौ अस जाइ सिखावनु देहू ॥ करै सो तपु जेहिं मिलिहिं महेसू । आन उपायँ न मिटिहि कलेसू ॥
नारद बचन सगर्भ सहेतू । सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू ॥ अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका । सबहि भाँति संकर अकलंका ॥
सुनि पति बचन हरषि मन माहीं । गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं ॥ उमहि बिलोकि नयन भरे बारी । सहित सनेह गोद बैठारी ॥
बारहिं बार लेति उर लाई । गदगद कंठ न कछु कहि जाई ॥ जगत मातु सर्वज्ञ भवानी । मातु सुखद बोलीं मृदु बानी ॥
प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान । पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान ॥ ७१ ॥
करहि जाइ तपु सैलकुमारी । नारद कहा सो सत्य बिचारी ॥ मातु पितहि पुनि यह मत भावा । तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा ॥
तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता । तपबल बिष्नु सकल जग त्राता ॥ तपबल संभु करहिं संघारा । तपबल सेषु धरइ महिभारा ॥
तप अधार सब सृष्टि भवानी । करहि जाइ तपु अस जियँ जानी ॥ सुनत बचन बिसमित महतारी । सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी ॥
मातु पितहि बहुबिधि समुझाई । चलीं उमा तप हित हरषाई ॥ प्रिय परिवार पिता अरु माता । भए बिकल मुख आव न बाता ॥
सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि । सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि ॥ ७२ ॥
उर धरि उमा प्रानपति चरना । जाइ बिपिन लागीं तपु करना ॥ अति सुकुमार न तनु तप जोगू । पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू ॥
नित नव चरन उपज अनुरागा । बिसरी देह तपहिं मनु लागा ॥ संवत सहस मूल फल खाए । सागु खाइ सत बरष गवाँए ॥
कछु दिन भोजनु बारि बतासा । किए कठिन कछु दिन उपबासा ॥ बेल पाती महि परइ सुखाई । तीनि सहस संवत सोइ खाई ॥
पुनि परिहरे सुखानेउ परना । उमहि नामु तब भयउ अपरना ॥ देखि उमहि तप खीन सरीरा । ब्रह्मगिरा भै गगन गंभीरा ॥
बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ । पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ ॥ ७३ ॥
अस तपु काहूँ न कीन्ह भवानी । भए अनेक धीर मुनि ग्यानी ॥ अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी । सत्य सदा संतत सुचि जानी ॥
आवै पिता बोलावन जबहीं । हठ परिहरि घर जाऐहु तबहीं ॥ मिलिहिं तुम्हहि जब सप्त ऋषीसा । जानेहु तब प्रमान बागीसा ॥
सुनत गिरा बिधि गगन बखानी । पुलक गात गिरिजा हरषानी ॥ उमा चरित सुंदर मैं गावा । सुनहु संभु कर चरित सुहावा ॥
जब तें सतीं जाइ तनु त्यागा । तब तें सिव मन भयउ बिरागा ॥ जपहिं सदा रघुनायक नामा । जहाँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा ॥
भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारी । परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि ॥ ७४ ॥
कतहुँ मुनीन्ह उपदेसहिं ग्याना । कतहुँ राम गुन करहिं बखाना ॥ जद्यपि अकाम तदपि भगवाना । भगत बिरह दुख दुखित सुजाना ॥
एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती । नित नै होइ राम पद प्रीती ॥ नेमु प्रेमु संकर कर देखा । अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा ॥
प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला । रूप सील निधि तेज बिसाला ॥ बहु प्रकार संकरहि सराहा । तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा ॥
बहुबिधि राम सिवहि समुझावा । पारबती कर जनमु सुनावा ॥ अति पुनीत गिरिजा कै करनी । बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी ॥
चिदानंद सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम । बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम ॥ ७५ ॥
कह सिव जद्यपि उचित अस नाहीं । नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं ॥ सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा । परम धरमु यह नाथ हमारा ॥
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी । बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ॥ तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी ॥
प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना । भक्ति बिबेक धरम जुत रचना ॥ कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ । अब उर राखेहु जो हम कहेऊ ॥
अंतरधान भए अस भाषी । संकर सोउ मूरति उर राखी ॥ तबहिं सप्तऋषि सिव पहिं आए । बोले प्रभु अति बचन सुहाए ॥
अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु । जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु ॥ ७६ ॥
ऋषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी । मूरतिमंत तपस्या जैसी ॥ बोले मुनि सुनु सैलकुमारी । करहु कवन कारन तप भारी ॥
केहि अवराधहु का तुम्ह चहहु । हम सन सत्य मरमु किन कहहु ॥ कहत बचन मनु अति सकुचाई । हँसिहहु सुनि हमारी जड़ताई ॥
मनु हठ परा न सुनइ सिखावा । चहत बारि पर भीति उठावा ॥ नारद कहा सत्य सोइ जाना । बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना ॥
देखहु मुनि अबिबेकु हमारा । चाहिअ सदा सिवहि भरतारा ॥
पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु । गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु ॥ ७७ ॥
दच्छसुतन्ह उपदेसिहि जाई । तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई ॥ चित्रकेतु कर घर उन घाला । कनककसिपु कर पुनि असि हाला ॥
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी । अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी ॥ मन कपटी तन सज्जन चीहा । आपु सरिस सबही चह कीहा ॥
तेहि के बचन मानि बिस्वासा । तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा ॥ निर्गुन निलज कुबेष कपाली । अकुल अगेंह दिगंबर ब्याली ॥
कहहु कवन सुखु अस बर पाएँ । भल भूलिहु ठग के बौराएँ ॥ पंच कहें सिवें सती बिबाही । पुनि अवडेरि मराइनि ताही ॥
सुनत बचन बिहसे ऋषय गिरिसंभव तब देह । नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह ॥ ७८ ॥
अजहुँ मानहु कहा हमारा । हम तुम्ह कहुँ बर नीक बिचारा ॥ अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला । गावहिं बेद जासु जस लीला ॥
दूपन रहित सकल गुन रासी । श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी ॥ अस बरु तुम्हहि मिलावब आनी । सुनत बिहसि कह बचन भवानी ॥
सत्य कहहु गिरिभव तनु एहा । हठ न छूट छुटे बर देहा ॥ कनकउ पुनि पषान तें होई । जारेंउ सहजु न परिहर सोई ॥
नारद बचन न मैं परिहरऊँ । बसउ भवनु उजड़उ नहिं डरऊँ ॥ गुर के बचन प्रतीति न जेही । सपनेहुँ सुगम न सुख सिद्धि तेही ॥
अब सुख सोवत सोचु नहीं भीख मागि भव खाहिं । सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं ॥ ७९ ॥
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा । सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा ॥ अब मैं जनमु संभु हित हारा । को गुन दूपन करै बिचारा ॥
जौं तुम्हरें हठ हृदयँ बिसेषी । रहि न जाइ बिनु किएँ बरेखी ॥ तौ कौतुकिअह आलसु नाहीं । बर कन्या अनेक जग माहीं ॥
जनम कोटि लगि रगर हमारी । बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी ॥ तजउँ न नारद कर उपदेसु । आपु कहहिं सत बार महेसु ॥
मैं पा परउँ कहउँ जगदंबा । तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा ॥ देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी । जय जय जगदंबिके भवानी ॥
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम । जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम ॥ ८० ॥
जाइ मुनीन्ह हिमवंतु पठाए । करि बिनती गिरिजहि गृह ल्याए ॥ बहुरि समरपि सिव पहिं जाई । कथा उमा के सकल सुनाई ॥
भए मगन सिव सुनत सनेहा । हरषि सप्तऋषि गवने गेहा ॥ मनु थिर करि तब संभु सुजाना । लगे करन रघुनायक ध्याना ॥
तारकु असुर भयउ तेहि काला । भुज प्रताप बल तेज बिसाला ॥ तेहिं सब लोक लोकपति जीते । भए देव सुख संपति रीते ॥
अजर अमर सो जीति न जाई । हारे सुर करि बिबिध लराई ॥ तब बिरंचि सन जाइ पुकारे । देखे बिधि सब देव दुखारे ॥
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु । नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु ॥ ८१ ॥
मोर कहा मुनि करहु उपाई । होइहि ईस्वर करिहि सहाई ॥ सतीं जो तजी दच्छ मख देहा । जनमीं जाइ हिमाचल गेहा ॥
तेहि तपु कीन्ह संभु पति लागी । सिव समाधि बैठे सब त्यागी ॥ जद्यपि अहह असमंजस भारी । तदपि बात एक सुनु हमारी ॥
पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं । करै छोभु संकर मन माहीं ॥ तब हम जाइ सिवहि सिर नाई । करवाउब बिबाहु बरिआई ॥
एहि बिधि भलेंहि देवहित होई । मत अति नीक कहहिं सब कोई ॥ अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू । प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू ॥
सब सन कह बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ । संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ ॥ ८२ ॥
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा । श्रुति कह परम धरम उपकारा ॥ पर हित लागि तजइ जो देही । संतत संत प्रसंसहि तेही ॥
अस कहि चले सबहि सिरु नाई । सुमन धनुष कर सहित सहाई ॥ चलत मार अस हृदयँ बिचारा । सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा ॥
तब आपन प्रभाउ बिस्तारा । निज बस कीन्ह सकल संसारा ॥ कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू । छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू ॥
ब्रह्मचरज ब्रत संजम नाना । धीरज धरम ग्यान बिग्याना ॥ सदाचार जप जोग बिरागा । सभय बिबेक कटकु सब भागा ॥
सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनी मन कीन्ह बिचारि । संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार ॥ ८३ ॥
भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे । सदग्रंथ पर्वत कंदरन्हि महुँ जाए तेहि अवसर दूरे ॥ होनिहार का करतार को रखवार जग खरभर परा । दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहूँ कोपि कर धनु सर धरा ॥
सब के हृदयँ मदन अभिलाषा । लता निहारि नवहिं तरु साखा ॥ नदी उमगि अंबुधि कहुँ धाई । संगम करहिं तलाव तलाई ॥
जहँ असि दसा जड़न्ह के बरनी । को कहि सकइ सचेतन करनी ॥ पसु पच्छी नभ जल थल चारी । भए कामबस समय बिसारी ॥
मदन अंध ब्याकुल सब लोका । निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका ॥ देव दनुज नर किंनर ब्याला । प्रेत पिसाच भूत बेताला ॥
इन्ह के दसा न कहौं बखानी । सदा काम के चेरे जानी ॥ सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी । तेपि कामबस भए बियोगी ॥
जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम । ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम ॥ ८४ ॥
भए कामबस जोगीस तापस पामरन्हि की को कहै । देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे ॥ अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयँ । दुउ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं ॥
धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे । जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ ॥ ८५ ॥
उभय घरी अस कौतुक भयउ । जौं लगि कामु संभु पहिं गयउ ॥ सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू । भयउ जथास्थिति सब संसारू ॥
भए तुरत सब जीव सुखारे । जिमि मद उतरि गएँ मतवारे ॥ रुद्रहि देखि मदन भय माना । दुराधर्ष दुर्गम भगवाना ॥
फिरत लाज कछु करि नहिं जाई । मरनु ठानि मन रचेसि उपाई ॥ प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा । कुसुमित नव तरु राजि बिराजा ॥
बन उपबन बापिका तड़ागा । परम सुभग सब दिसा विभागा ॥ जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा । देखि मुएहूँ मन मनसिज जागा ॥
जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही । सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही ॥ बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा । कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा ॥
देखि रसाल बिटप बर साखा । तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा ॥ सुमन चाप निज सर संधाने । अति रिसि तांकि श्रवन लगि ताने ॥
छाड़े बिषम बिसिख उर लागे । छूटि समाधि संभु तब जागे ॥ भयउ ईस मन छोभु बिसेषी । नयन उघारि सकल दिसि देखी ॥
सौरभ पल्लव मदनु बिलोका । भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका ॥ तब सिवँ तीसर नयन उघारा । चितवत कामु भयउ जरि छारा ॥
हाहाकार भयउ जग भारी । डरे सुर भए असुर सुखारी ॥ समुझि कामसुख सोचहिं भोगी । भए अकंटक साधक जोगी ॥
सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत । चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयँनिकेत ॥ ८६ ॥
जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई । रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई ॥ अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही । प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही ॥
जब जदुबंस कृष्ण अवतारा । होइहि हरन महा महिभारा ॥ कृष्ण तनय होइहि पति तोरा । बचनु अन्यथा होइ न मोरा ॥
रति गवनी सुनि संकर बानी । कथा अपर अब कहउँ बखानी ॥ देवन्ह समाचार सब पाए । ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए ॥
सब सुर बिष्णु बिरंचि समेता । गए जहाँ सिव कृपानिकेता ॥ पृथक पृथक तिन्ह कीन्ह प्रसंसा । भए प्रसन्न चंद अवतंसा ॥
बोले कृपासिंधु बृषकेतू । कहहु अमर आए केहि हेतु ॥ कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी । तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी ॥
अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु । बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु ॥ ८७ ॥
यह उत्सव देखिअ भरि लोचन । सोइ कछु करहु मदन मद मोचन ॥ कामु जारि रति कहुँ बर दीन्हा । कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा ॥
सासति करि पुनि करहिं पसाऊ । नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ ॥ पारबतीं तपु कीन्ह अपारा । करहु तासु अब अंगीकारा ॥
सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी । ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी ॥ तब देवन्ह दुंदुभीं बजाई । बरषि सुमन जय जय सुर साई ॥
अवसर जानि सप्तऋषि आए । तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए ॥ प्रथम गए जहाँ रहीं भवानी । बोले मधुर बचन छल सानी ॥
सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु । निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु ॥ ८८ ॥
सुनि बोलीं मुसुकाइ भवानी । उचित कहेहु मुनिवर बिग्यानी ॥ तुम्हरें जान कामु अब जारा । अब लगि संभु रहे सबिकारा ॥
हमरें जान सदा सिव जोगी । अज अनवद्य अकाम अभोगी ॥ जौं मैं सिव सेये अस जानी । प्रीति समेत कर्म मन बानी ॥
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा । करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा ॥ तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा । सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा ॥
तात अनल कर सहज सुभाऊ । हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ ॥ गएँ समीप सो अवसि नसाई । असि मन्मथ महेस की नाई ॥
कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस । अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस ॥ ८९ ॥