ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
काण्ड 1

श्रीरामचरितमानसबाल काण्ड

कुल 1,913 पद/श्लोक

श्लोक 2बाल काण्ड
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥ २ ॥
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श्लोक 6बाल काण्ड
यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥ ६ ॥
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श्लोक 7बाल काण्ड
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-
भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति ॥ ७ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के । मिटहिं दोष दुख भव रजनी के ॥
सूझहिं राम चरित मनि मानिक । गुपुत प्रगट जहाँ जो जेहि खानिक ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन । नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन ॥
तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन । बरनउँ राम चरित भव मोचन ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना । मोह जनित संसय सब हरना ॥
सुजन समाज सकल गुन खानी । करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
साधु चरित सुभ चरित कपासू । निरस बिसद गुनमय फल जासू ॥
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा । बंदनीय जेहिं जग जस पावा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
मुद मंगलमय संत समाजू । जो जग जंगम तीरथराजू ॥
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा । सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
बिधि निषेधमय कलिमल हरनी । करम कथा रबिनंदनि बरनी ॥
हरि हर कथा बिराजति बेनी । सुनत सकल मुद मंगल देनी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
मज्जन फल पेखिअ ततकाला । काक होहिं पिक बकउ मराला ॥
सुनि आचरज करै जनि कोई । सतसंगति महिमा नहिं गोई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई ॥
सो जानब सतसंग प्रभाऊ । लोकहुँ बेद न आन उपाऊ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बिनु सतसंग बिबेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥
सतसंगत मुद मंगल मूला । सोइ फल सिधि सब साधन फूला ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधात सुहाई ॥
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं । फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं ॥
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चौपाई 6बाल काण्ड
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी । कहत साधु महिमा सकुचानी ॥
सो मो सन कहि जात न कैसें । साक बनिक मनि गुन गन जैसें ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं । जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं ॥
बंदउँ खल जस सेष सरोषा । सहस बदन बरनइ पर दोषा ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना । पर अघ सुनइ सहस दस काना ॥
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही । संतत सुरानीक हित जेही ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा । तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा ॥
बायस पलिअहिं अति अनुरागा । होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बंदउँ संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुन देहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
उपजहिं एक संग जग माहीं । जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं ॥
सुधा सुरा सम साधु असाधू । जनक एक जग जलधि अगाधू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
भल अनभल निज निज करतूती । लहत सुजस अपलोक बिभूती ॥
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू । गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू ॥
गुन अवगुन जानत सब कोई । जो जेहि भाव नीक तेहि सोई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
खल अघ अगुन साधु गुन गाहा । उभय अपार उदधि अवगाहा ॥
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने । संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए । गनि गुन दोष बेद बिलगाए ॥
कहहिं बेद इतिहास पुराना । बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
दुख सुख पाप पुन्य दिन राती । साधु असाधु सुजाति कुजाती ॥
दानव देव ऊँच अरु नीचू । अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू ॥
माया ब्रह्म जीव जगदीसा । लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा ॥
कासी मग सुरसरि क्रमनासा । मरु मारव महिदेव गवासा ॥
सरग नरक अनुराग बिरागा । निगमागम गुन दोष बिभागा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अस बिबेक जब देइ बिधाता । तब तजि दोष गुनहिं मनु राता ॥
काल सुभाउ करम बरिआईं । भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं । दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं ॥
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू । मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ । बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ ॥
उघरहिं अंत न होइ निबाहू । कालनेमि जिमि रावन राहू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू । जिमि जग जामवंत हनुमानू ॥
हानि कुसंग सुसंगति लाहू । लोकहुँ बेद बिदित सब काहू ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा । कीचहिं मिलइ नीच जल संगा ॥
साधु असाधु सदन सुक सारीं । सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं ॥
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चौपाई 6बाल काण्ड
धूम कुसंगति कारिख होई । लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई ॥
सोइ जल अनल अनिल संघाता । होइ जलद जग जीवन दाता ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जानि कृपाकर किंकर मोहू । सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू ॥
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं । तातें बिनय करउँ सब पाहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी । चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी ॥
छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई । सुनिहहिं बालबचन मन लाई ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
जौं बालक कह तोतरि बाता । सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता ॥
हँसिहहिं क्रूर कुटिल कुबिचारी । जे पर दूषन भूषनधारी ॥
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चौपाई 6बाल काण्ड
निज कबित्त केहि लाग न नीका । सरस होउ अथवा अति फीका ॥
जे पर भनिति सुनत हरषाहीं । ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं ॥
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चौपाई 7बाल काण्ड
जग बहु नर सर सरि सम भाई । जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई ॥
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई । देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
खल परिहास होइ हित मोरा । काक कहहिं कलकंठ कठोरा ॥
हंसहि बक दादुर चातकही । हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
कबित रसिक न राम पद नेहू । तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू ॥
भाषा भनिति भोरि मति मोरी । हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी । तिन्हहि कथा सुनि लागिहि फीकी ॥
हरि हर पद रति मति न कुतरकी । तिन्ह कहँ मधुर कथा रघुबर की ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
राम भगति भूषित जियँ जानी । सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी ॥
कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू । सकल कला सब बिद्या हीनू ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
आखर अरथ अलंकृति नाना । छंद प्रबंध अनेक बिधाना ॥
भाव भेद रस भेद अपारा । कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एहि महँ रघुपति नाम उदारा । अति पावन पुरान श्रुति सारा ॥
मंगल भवन अमंगल हारी । उमा सहित जेहि जपत पुरारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ । राम नाम बिनु सोह न सोऊ ॥
बिधुबदनी सब भाँति सँवारी । सोह न बसन बिना बर नारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सब गुन रहित कुकबि कृत बानी । राम नाम जस अंकित जानी ॥
सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही । मधुकर सरिस संत गुनग्राही ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जदपि कबित रस एकउ नाहीं । राम प्रताप प्रगट एहि माहीं ॥
सोइ भरोस मोरें मन आवा । केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा ॥
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दोहा 9बाल काण्ड
दो०—भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक ।
सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिबेक ॥ ९ ॥
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छंद 1बाल काण्ड
छं०— मंगल करनि कलिमलहरनि तुलसी कथा रघुनाथ की ।
गति क्रूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की ॥
प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी ।
भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी । अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी ॥
नृप किरीट तरुनी तनु पाई । लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं । उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं ॥
भगति हेतु बिधि भवन बिहाई । सुमिरत सारद आवति धाई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ । सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ ॥
कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी । गावहिं हरि जस कलि मल हारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना । सिर धुनि गिरा लगत पछिताना ॥
हृदय सिंधु मति सीप समाना । स्वाति सारदा कहहिं सुजाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बंचक भगत कहाइ राम के । किंकर कंचन कोह काम के ॥
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी । धींग धरमध्वज धंधक धोरी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जौं अपने अवगुन सब कहऊँ । बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ ॥
ताते मैं अति अलप बखाने । थोरे महुँ जानिहहिं सयाने ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी । कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी ॥
एतेहु पर करिहहिं जे असंका । मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ । मति अनुरूप राम गुन गावउँ ॥
कहँ रघुपति के चरित अपारा । कहँ मति मोरि निरत संसारा ॥
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चौपाई 6बाल काण्ड
जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं । कहहु तूल केहि लेखे माहीं ॥
समुझत अमित राम प्रभुताई । करत कथा मन अति कदराई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई । तदपि कहें बिनु रहा न कोई ॥
तहाँ बेद अस कारन राखा । भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानंद पर धामा ॥
ब्यापक बिस्वरुप भगवाना । तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सो केवल भगतन हित लागी । परम कृपाल प्रनत अनुरागी ॥
जेहि जन पर ममता अति छोहू । जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
गई बहोर गरीब नेवाजू । सरल सबल साहिब रघुराजू ॥
बुध बरनहिं हरि जस अस जानी । करहिं पुनीत सुफल निज बानी ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा । कहिहउँ नाइ राम पद माथा ॥
मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई । तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एहि प्रकार बल मनहि देखाई । करिहउँ रघुपति कथा सुहाई ॥
ब्यास आदि कबि पुंगव नाना । जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे । पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे ॥
कलि के कबिन्ह करउँ परनामा । जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जे प्राकृत कबि परम सयाने । भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने ॥
भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें । प्रनवउँ सबहि कपट सब त्यागें ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
होहु प्रसन्न देहु बरदानू । साधु समाज भनिति सनमानू ॥
जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं । सो श्रम बादि बाल कबि करहीं ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
कीरति भनिति भूति भलि सोई । सुरसरि सम सब कहँ हित होई ॥
राम सुकीरति भनिति भदेसा । असमंजस अस मोहि अँदेसा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता । जुगल पुनीत मनोहर चरिता ॥
मज्जन पान पाप हर एका । कहत सुनत एक हर अबिबेका ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
गुर पितु मातु महेस भवानी । प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी ॥
सेवक स्वामि सखा सिय पी के । हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा । साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा ॥
अनमिल आखर अरथ न जापू । प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सो उमेस मोहि पर अनुकूला । करिहिं कथा मुद मंगल मूला ॥
सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ । बरनउँ रामचरित चित चाऊ ॥
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चौपाई 14बाल काण्ड
भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती । ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती ॥
जे एहि कथहि सनेह समेता । कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता ॥
होइहहिं राम चरन अनुरागी । कलि मल रहित सुमंगल भागी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि । सरजू सरि कलि कलुष नसावनि ॥
प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी । ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी ॥
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चौपाई 15बाल काण्ड
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू । बिस्व सुखद खल कमल तुसारू ॥
दसरथ राउ सहित सब रानी । सुकृत सुमंगल मूरति मानी ॥
करउँ प्रनाम करम मन बानी । करहु कृपा सुत सेवक जानी ॥
जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता । महिमा अवधि राम पितु माता ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू । जाहि राम पद गूढ़ सनेहू ॥
जोग भोग महँ राखेउ गोई । राम बिलोकत प्रगटेउ सोई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना । जासु नेम ब्रत जाइ न बरना ॥
राम चरन पंकज मन जासू । लुबुध मधुप इव तजइ न पासू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सेष सहस्रसीस जग कारन । जो अवतरेउ भूमि भय टारन ॥
सदा सो सानुकूल रह मो पर । कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
रघुपति चरन उपासक जेते । खग मृग सुर नर असुर समेते ॥
बंदउँ पद सरोज सब केरे । जे बिनु काम राम के चेरे ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सुक सनकादि भगत मुनि नारद । जे मुनिबर बिग्यान बिसारद ॥
प्रनवउँ सबहि धरनि धरि सीसा । करहु कृपा जन जानि मुनीसा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जनकसुता जग जननि जानकी । अतिसय प्रिय करुनानिधान की ॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ । जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक । चरन कमल बंदउँ सब लायक ॥
राजिवनयन धरें धनु सायक । भगत बिपति भंजन सुखदायक ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बंदउँ नाम राम रघुबर को । हेतु कृसानु भानु हिमकर को ॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान सो ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
महामंत्र जोइ जपत महेसू । कासीं मुकुति हेतु उपदेसू ॥
महिमा जासु जान गनराऊ । प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जान आदिकबि नाम प्रतापू । भयउ सुद्ध करि उलटा जापू ॥
सहस नाम सम सुनि सिव बानी । जपि जेईं पिय संग भवानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
हरषे हेतु हेरि हर ही को । किय भूषन तिय भूषन ती को ॥
नाम प्रभाउ जान सिव नीको । कालकूट फलु दीन्ह अमी को ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके । राम लखन सम प्रिय तुलसी के ॥
बरनत बरन प्रीति बिलगाती । ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
नर नारायन सरिस सुभ्राता । जग पालक बिसेषि जन त्राता ॥
भगति सुतिय कल करन बिभूषन । जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के । कमठ सेष सम धर बसुधा के ॥
जन मन मंजु कंज मधुकर से । जीह जसोमति हरि हलधर से ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
समुझत सरिस नाम अरु नामी । प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी ॥
नाम रूप दुइ ईस उपाधी । अकथ अनादि सुसामुझि साधी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
को बड़ छोट कहत अपराधू । सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू ॥
देखिअहिं रूप नाम आधीना । रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
रूप बिसेष नाम बिनु जानें । करतल गत न परहिं पहिचानें ॥
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें । आवत हृदयँ सनेह बिसेषें ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
नाम रूप गति अकथ कहानी । समुझत सुखद न परति बखानी ॥
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी । उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी । बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी ॥
ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा । अकथ अनामय नाम न रूपा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ । नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ ॥
साधक नाम जपहिं लय लाएँ । होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा । अकथ अगाध अनादि अनूपा ॥
मोरें मत बड़ नामु दुहू तें । किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी । सकल जीव जग दीन दुखारी ॥
नाम निरूपन नाम जतन तें । सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें ॥
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चौपाई 23बाल काण्ड
प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की । कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की ॥
एकु दारुगत देखिअ एकू । पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू ॥
उभय अगम जुग सुगम नाम तें । कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें ॥
ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी । सत चेतन घन आनँद रासी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
राम भालु कपि कटकु बटोरा । सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा ॥
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं । करहु बिचारु सुजन मन माहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
राम सकुल रन रावनु मारा । सीय सहित निज पुर पगु धारा ॥
राजा रामु अवध रजधानी । गावत गुन सुर मुनि बर बानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती । बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती ॥
फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें । नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नाम प्रसाद संभु अबिनासी । साजु अमंगल मंगल रासी ॥
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी । नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
नारद जानेउ नाम प्रतापू । जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू ॥
नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू । भगत सिरोमनि भे प्रहलादू ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ । पायउ अचल अनूपम ठाऊँ ॥
सुमिरि पवनसुत पावन नामू । अपने बस करि राखे रामू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ । भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ ॥
कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई । रामु न सकहिं नाम गुन गाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका । भए नाम जपि जीव बिसोका ॥
बेद पुरान संत मत एहू । सकल सुकृत फल राम सनेहू ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
ध्यानु प्रथम जुग मख बिधि दूजें । द्वापर परितोषत प्रभु पूजें ॥
कलि केवल मल मूल मलीना । पाप पयोनिधि जन मन मीना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
नाम कामतरु काल कराला । सुमिरत समन सकल जग जाला ॥
राम नाम कलि अभिमत दाता । हित परलोक लोक पितु माता ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू । राम नाम अवलंबन एकू ॥
कालनेमि कलि कपट निधानू । नाम सुमति समरथ हनुमानू ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ । नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा । करउँ नाइ रघुनाथहि माथा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती । जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती ॥
राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो । निज दिसि देखि दयानिधि पोसो ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
लोकहुँ बेद सुसाहिब रीती । बिनय सुनत पहिचानत प्रीती ॥
गनी गरीब ग्राम नर नागर । पंडित मूढ़ मलीन उजागर ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी । नृपहि सराहत सब नर नारी ॥
साधु सुजान सुसील नृपाला । ईस अंस भव परम कृपाला ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी । भनिति भगति नति गति पहिचानी ॥
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ । जान सिरोमनि कोसलराऊ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी । सुनि अघ नरकहूँ नाक सकोरी ॥
समुझि सहम मोहि अपडर अपनेँ । सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनेँ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सुनि अवलोकि सुचित चख चाही । भगति मोरि मति स्वामि सराही ॥
कहत नसाइ होइ हियँ नीकी । रीझत राम जानि जन जी की ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
रहति न प्रभु चित चूक किए की । करत सुरति सय बार हिए की ॥
जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली । फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सोइ करतूति बिभीषन केरी । सपनेहूँ सो न राम हियँ हेरी ॥
ते भरतहि भेंटत सनमाने । राजसभाँ रघुबीर बखाने ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जागबलिक जो कथा सुहाई । भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई ॥
कहिहउँ सोइ संवाद बखानी । सुनहु सकल सज्जन सुखु मानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
संभु कीन्ह यह चरित सुहावा । बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा ॥
सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा । राम भगत अधिकारी चीन्हा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तेहि सन जागबलिक पुनि पावा । तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा ॥
ते श्रोता बकता समसीला । सबदरसी जानहिं हरिलीला ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जानहिं तीनि काल निज ग्याना । करतल गत आमलक समाना ॥
औरउ जे हरिभगत सुजाना । कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तदपि कही गुर बारहिं बारा । समुझि परी कछु मति अनुसारा ॥
भाषाबद्ध करबि मैं सोई । मोरें मन प्रबोध जेहि होई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जस कछु बुधि बिबेक बल मेरे । तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें ॥
निज संदेह मोह भ्रम हरनी । करउँ कथा भव सरिता तरनी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि । रामकथा कलि कलुष बिभंजनि ॥
रामकथा कलि पन्नग भरनी । पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
रामकथा कलि कामद गाई । सुजन सजीवनि मूरि सुहाई ॥
सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि । भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
असुर सेन सम नरक निकंदिनि । साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि ॥
संत समाज पयोधि रमा सी । बिस्व भार भर अचल छमा सी ॥
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चौपाई 6बाल काण्ड
जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी । जीवन मुकुति हेतु जनु कासी ॥
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी । तुलसीदास हित हियँ हुलसी सी ॥
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चौपाई 7बाल काण्ड
सिवप्रिय मेकल सैल सुता सी । सकल सिद्धि सुख संपति रासी ॥
सदगुन सुरगन अंब अदिति सी । रघुबर भगति प्रेम परिमिति सी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
रामचरित चिंतामनि चारु । संत सुमति तिय सुभग सिंगारु ॥
जग मंगल गुनग्राम राम के । दानि मुकुति धन धरम धाम के ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सदगुर ग्यान बिराग जोग के । बिबुध बैद भव भीम रोग के ॥
जननि जनक सिय राम प्रेम के । बीज सकल ब्रत धरम नेम के ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
समन पाप संताप सोक के । प्रिय पालक परलोक लोक के ॥
सचिव सुभट भूपति बिचार के । कुंभज लोभ उदधि अपार के ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
काम कोह कलिमल करिगन के । केहरि सावक जन मन बन के ॥
अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद घन दारिद दवारि के ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥
हरन मोह तम दिनकर कर से । सेवक सालि पाल जलधर से ॥
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चौपाई 6बाल काण्ड
अभिमत दानि देवतरु बर से । सेवत सुलभ सुखद हरि हर से ॥
सुकबि सरद नभ मन उडगन से । रामभगत जन जीवन धन से ॥
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चौपाई 7बाल काण्ड
सकल सुकृत फल भूरि भोग से । जग हित निरुपधि साधु लोग से ॥
सेवक मन मानस मराल से । पावन गंग तरंग माल से ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी । जेहि बिधि संकर कहा बखानी ॥
सो सब हेतु कहब मैं गाई । कथा प्रबंध बिचित्र बनाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जेहि यह कथा सुनी नहिं होई । जनि आचरजु करे सुनि सोई ॥
कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी । नहिं आचरजु करहिं अस जानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
रामकथा के मिति जग नाहीं । असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं ॥
नाना भाँति राम अवतारा । रामायन सत कोटि अपारा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कल्पभेद हरिचरित सुहाए । भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए ॥
करिअ न संसय अस उर आनी । सुनिअ कथा सादर रति मानी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एहि बिधि सब संसय करि दूरी । सिर धरि गुर पद पंकज धूरी ॥
पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी । करत कथा जेहिं लाग न खोरी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सादर सिवहि नाइ अब माथा । बरनउँ बिसद राम गुन गाथा ॥
संवत सोरह सै एकतीसा । करउँ कथा हरि पद धरि सीसा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
नौमी भौम बार मधुमासा । अवधपुरीं यह चरित प्रकासा ॥
जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं । तीरथ सकल तहँ चलि आवहिं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
असुर नाग खग नर मुनि देवा । आइ करहिं रघुनायक सेवा ॥
जनम महोत्सव रचहिं सुजाना । करहिं राम कल कीरति गाना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
दरस परस मज्जन अरु पाना । हरइ पाप कह बेद पुराना ॥
नदी पुनीत अमित महिमा अति । कहि न सकइ सारदा बिमल मति ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
राम धामदा पुरी सुहावनि । लोक समस्त बिदित अति पावनि ॥
चारि खानि जग जीव अपारा । अवध तजें तनु नहिं संसारा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सब बिधि पुरी मनोहर जानी । सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी ॥
बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा । सुनत नसाहिं काम मद दंभा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
रामचरितमानस एहि नामा । सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा ॥
मन करि बिषय अनल बन जरई । होइ सुखी जौं एहि सर परई ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
रामचरितमानस मुनि भावन । बिरचेउ संभु सुहावन पावन ॥
त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन । कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन ॥
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चौपाई 6बाल काण्ड
रचि महेस निज मानस राखा । पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा ॥
तातें रामचरितमानस बर । धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी । रामचरितमानस कवि तुलसी ॥
करउँ मनोहर मति अनुहारी । सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सुमति भूमि थल हृदय अगाधू । बेद पुरान उदधि घन साधू ॥
बरषहिं राम सुजस बर बारी । मधुर मनोहर मंगलकारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
लीला सगुन जो कहहिं बखानी । सोइ स्वच्छता करइ मल हानी ॥
प्रेम भगति जो बरनि न जाई । सोइ मधुरता सुसीतलताई ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
मेधा महि गत सो जल पावन । सकलि श्रवन मग चलेउ सुहावन ॥
भरेउ सुमानस सुथल थिराना । सुखद सीत रुचि चारु चिराना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सम प्रबंध सुभग सोपाना । ग्यान नयन निरखत मन माना ॥
रघुपति महिमा अगुन अबाधा । बरनब सोइ बर बारि अगाधा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
राम सीय जस सलिल सुधासम । उपमा बीचि बिलास मनोरम ॥
पुरइनि सघन चारु चौपाई । जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सुकृत पुंज मंजुल अलि माला । ग्यान बिराग बिचार मराला ॥
धुनि अवरेब कवित गुन जाती । मीन मनोहर ते बहुभाँती ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
अरथ धरम कामादिक चारी । कहब ग्यान बिग्यान बिचारी ॥
नव रस जप तप जोग बिरागा । ते सब जलचर चारु तड़ागा ॥
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चौपाई 6बाल काण्ड
सुकृती साधु नाम गुन गाना । ते बिचित्र जलबिहग समाना ॥
संतसभा चहुँ दिसि अवराईं । श्रद्धा रितु बसंत सम गाई ॥
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चौपाई 7बाल काण्ड
भगति निरूपन बिबिध बिधाना । छमा दया दम लता बिताना ॥
सम जम नियम फूल फल ग्याना । हरि पद रति रस बेद बखाना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जे गावहिं यह चरित सँभारे । तेइ एहि ताल चतुर रखवारे ॥
सदा सुनहिं सादर नर नारी । तेइ सुरवर मानस अधिकारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अति खल जे बिषई बग कागा । एहि सर निकट न जाहिं अभागा ॥
संबुक भेक सेवार समाना । इहाँ न बिषय कथा रस नाना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कठिन कुसंग कुपंथ कराला । तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला ॥
गृह कारज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोइ । जातहिं नींद जुड़ाई होइ ॥
जड़ता जाइ बिषम उर लागा । गइउँ न मज्जन पाव अभागा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
करि न जाइ सर मज्जन पाना । फिरि आवइ समेत अभिमाना ॥
जौं बहोरि कोउ पूछन आवा । सर निंदा करि ताहि बुझावा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सकल बिघ्न ब्यापहिं नहिं तेही । राम सुकृपा बिलोकहिं जेही ॥
सोइ सादर सर मज्जनु करई । महा घोर त्रयताप न जरई ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
अस मानस मानस चख चाही । भई कबि बुद्धि बिमल अवगाही ॥
भयउ हृदयँ आनंद उछाहू । उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रवाहू ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
रामभगति सुरसरितहि जाई । मिली सुकीरति सरजू सुहाई ॥
सानुज राम समर जसु पावन । मिलेउ महानदु सोन सुहावन ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जुग बिच भगति देवधुनि धारा । सोहति सहित सुबिरति बिचारा ॥
त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी । राम सरूप सिंधु समुहानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
मानस मूल मिली सुरसरिही । सुनत सुजन मन पावन करिही ॥
बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा । जनु सरि तीर तीर बन बागा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सीय स्वयंबर कथा सुहाई । सरित सुहावनि सो छबि छाई ॥
नदी नाव पटु प्रस्न अनेका । केवट कुसल उत्तर सबिबेका ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सुनि अनुकथन परस्पर होई । पथिक समाज सोह सरि सोई ॥
घोर धार भृगुनाथ रिसानी । घाट सुबद्ध राम बर बानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सानुज राम बिबाह उछाहू । सो सुभ उमग सुखद सब काहू ॥
कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं । ते सुकृती मन मुदित नहाहीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कीरति सरित छहुँ रितु रूरी । समय सुहावनि पावनि भूरी ॥
हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू । सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बरषा घोर निसाचर रारी । सुरकुल सालि सुमंगलकारी ॥
राम राज सुख बिनय बड़ाई । बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
राम सुप्रेमहि पोषत पानी । हरत सकल कलि कलुष गलानी ॥
भव श्रम सोषक तोषक तोषा । समन दुरित दुख दारिद दोषा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
काम कोह मद मोह नसावन । बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन ॥
सादर मज्जन पान किए तें । मिटहिं पाप परिताप हिए तें ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जिन्ह एहि बारि न मानस धोए । ते कायर कलिकाल बिगोए ॥
तृषित निरखि रवि कर भव बारी । फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा । तिन्हहि राम पद अति अनुरागा ॥
तापस सम दम दया निधाना । परमारथ पथ परम सुजाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
माघ मकरगत रबि जब होई । तीरथपतिहिं आव सब कोई ॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनी । सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
पूजहिं माधव पद जलजाता । परसि अक्षयवट हरषहिं गाता ॥
भरद्वाज आश्रम अति पावन । परम रम्य मुनिबर मन भावन ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तहाँ होइ मुनि ऋषय समाजा । जाहिं जे मज्जन तीरथराजा ॥
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा । कहहिं परस्पर हरि गुन गाहा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं । पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं ॥
प्रति संबत अति होइ अनंदा । मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सादर चरन सरोज पखारे । अति पुनीत आसन बैठारे ॥
करि पूजा मुनि सुजसु बखानी । बोले अति पुनीत मृदु बानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
नाथ एक संसउ बड़ मोरें । करगत बेदतत्त्व सब तोरें ॥
कहत सो मोहि लागत भय लाजा । जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू । हरहु नाथ करि जन पर छोहू ॥
राम नाम कर अमित प्रभावा । संत पुरान उपनिषद गावा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
संतत जपत संभु अबिनासी । सिव भगवान ग्यान गुन रासी ॥
आकर चारि जीव जग अहहीं । कासीं मरत परम पद लहहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सोपि राम महिमा मुनिराया । सिव उपदेसु करत करि दाया ॥
राम कवन प्रभु पूछउँ तोही । कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
एक राम अवधेस कुमारा । तिन्ह कर चरित बिदित संसारा ॥
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा । भयउ रोषु रन रावनु मारा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जैसें मिटे मोर भ्रम भारी । कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी ॥
जागबलिक बोले मुसुकाई । तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी । चतुराई तुम्हारि मैं जानी ॥
चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा । कीन्हहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एक बार त्रेता जुग माहीं । संभु गए कुंभज ऋषि पाहीं ॥
संग सती जगजननि भवानी । पूजे ऋषि अखिलेस्वर जानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
रामकथा मुनिबर्ज बखानी । सुनी महेस परम सुखु मानी ॥
ऋषि पूछी हरिभगति सुहाई । कही संभु अधिकारी पाई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कहत सुनत रघुपति गुन गाथा । कछु दिन तहँ रहे गिरिनाथा ॥
मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी । चले भवन संग दच्छकुमारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तेहि अवसर भंजन महिभारा । हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा ॥
पिता बचन तजि राजु उदासी । दंडक बन बिचरत अबिनासी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
रावन मरन मनुज कर जाचा । प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा ॥
जौं नहिं जाउँ रहउ पछितावा । करत बिचारु न बनत बनावा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
करि छलु मूढ़ हरी बैदेही । प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही ॥
मृग बधि बंधु सहित हरि आए । आश्रमु देखि नयन जल छाए ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बिरह बिकल नर इव रघुराई । खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई ॥
कबहूँ जोग बियोग न जाकें । देखा प्रगट बिरह दुखु ताकें ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
संभु समय तेहि रामहि देखा । उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा ॥
भरि लोचन छबिसिंधु निहारी । कुसमय जानि न कीन्ह चिहारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जय सच्चिदानंद जग पावन । अस कहि चलेउ मनोज नसावन ॥
चले जात सिव सती समेताँ । पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सतीं सो दसा संभु कै देखी । उर उपजा संदेहु बिसेषी ॥
संकर जगतबंद्य जगदीसा । सुर नर मुनि सब नावत सीसा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा । कहि सच्चिदानंद परधामा ॥
भए मगन छबि तासु बिलोकी । अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी । सोउ सर्वज्ञ जथा त्रिपुरारी ॥
खोजइ सो कि अग्य इव नारी । ग्यानधाम श्रीपति असुरारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
संभुगिरा पुनि मृषा न होई । सिव सर्वज्ञ जान सबु कोई ॥
अस संसय मन भयउ अपारा । होइ न हृदयँ प्रबोध प्रचारा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी । हर अंतरजामी सब जानी ॥
सुनहि सती तव नारि सुभाऊ । संसय अस न धरिअ उर काऊ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जासु कथा कुंभज ऋषि गाई । भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई ॥
सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा । सेवत जाहि सदा मुनि धीरा ॥
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छंद 50बाल काण्ड
मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं ।
कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं ॥
सोइ रामु व्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी ।
अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू । तौ किन जाइ परीक्षा लेहू ॥
तब लगि बैठ अहउँ बटछाहीं । जब लगि तुम्ह एहि मोहिं पाहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी । करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी ॥
चलीं सती सिव आयसु पाई । करहिं बिचार करौं का भाई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
इहाँ संभु अस मन अनुमाना । दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना ॥
मोरेहुँ कहें न संसय जाहीं । बिधि बिपरीत भलाई नाहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
होइहि सोइ जो राम रचि राखा । को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा । गई सती जहँ प्रभु सुखधामा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
लछिमन दीख उमाकृत बेषा । चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा ॥
कहि न सकत कछु अति गंभीरा । प्रभु प्रभाव जानत मतिधीरा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सती कपटु जानेउ सुरस्वामी । सबदरसी सब अंतरजामी ॥
सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना । सोइ सरबग्य रामु भगवाना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सतीं कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊँ । देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ ॥
निज माया बलु हृदयँ बखानी । बोले बिहसि रामु मृदु बानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जाना राम सतीं दुखु पावा । निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा ॥
सतीं दीख कौतुकु मग जाता । आगें रामु सहित श्री भ्राता ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा । सहित बंधु सिय सुंदर बेषा ॥
जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना । सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका । अमित प्रभाउ एक तें एका ॥
बंदत चरन करत प्रभु सेवा । बिविध बेष देखे सब देवा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते । सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते ॥
जीव चराचर जो संसारा । देखे सकल अनेक प्रकारा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा । राम रूप दूसर नहिं देखा ॥
अवलोके रघुपति बहुतेरे । सीता सहित न बेष घनेरे ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता । देखि सती अति भईं सभीता ॥
हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं । नयन मूदि बैठीं मग माहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी । कछु न दीख तहाँ दच्छकुमारी ॥
पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा । चलीं तहँ जहाँ रहे गिरीसा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ । भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ ॥
कछु न परीक्षा लीन्हि गोसाईं । कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाईं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई । मोरें मन प्रतीति अति सोई ॥
तब संकर देखेउ धरि ध्याना । सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बहुरि राममायहि सिरु नावा । प्रेरि सतिहि जेहिं झूठ कहावा ॥
हरि इच्छा भावी बलवाना । हृदयँ बिचारत संभु सुजाना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सतीं कीन्ह सीता कर बेषा । सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा ॥
जौं अब करउँ सती सन प्रीती । मिटइ भगति पथु होइ अनीती ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा । सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा ॥
एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं । सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अस बिचारि संकर मतिधीरा । चले भवन सुमिरत रघुबीरा ॥
चलत गगन भै गिरा सुहाई । जय महेस भलि भगति दृढ़ाई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना । रामभगत समर्थ भगवाना ॥
सुनि नभगिरा सती उर सोचा । पूछा सिवहि समेत सकोचा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला । सत्यधाम प्रभु दीनदयाला ॥
जदपि सतीं पूछा बहु भाँती । तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी । चिंता अमित जाइ नहिं बरनी ॥
कृपासिंधु सिव परम अगाधा । प्रगट न कहेउ मोर अपराधा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
संकर रुख अवलोकि भवानी । प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी ॥
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई । तपइ अवाँ इव उर अधिकाई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू । कहीं कथा सुंदर सुखहेतू ॥
बरनत पंथ बिबिध इतिहासा । बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तहाँ पुनि संभु समुझि पन आपन । बैठे बटतर करि कमलासन ॥
संकर सहज सरूपु सम्हारा । लागि समाधि अखंड अपारा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नित नव सोचु सती उर भारा । कब जैहउँ दुख सागर पारा ॥
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना । पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सो फल मोहि बिधाताँ दीन्हा । जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा ॥
अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही । संकर बिमुख जिआवसि मोही ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कहि न जाइ कछु हृदय गलानी । मन महुँ रामहि सुमिर सयानी ॥
जौं प्रभु दीनदयालु कहावा । आरति हरन बेद जसु गावा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी । छूटउ बेगि देह यह मोरी ॥
जौं मोरें सिव चरन सनेहू । मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी । अकथनीय दारुन दुख भारी ॥
बीतें संबत सहस सतासी । तजी समाधि संभु अबिनासी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
राम नाम सिव सुमिरन लागे । जानेउ सतीं जगतपति जागे ॥
जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा । सनमुख संकर आसनु दीन्हा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
लगे कहन हरिकथा रसाला । दच्छ प्रजेस भए तेहि काला ॥
देखा बिधि बिचारि सब लायक । दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा । अति अभिमानु हृदयँ तब आवा ॥
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं । प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा । बधुन्ह समेत चले सुर सर्वा ॥
बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई । चले सकल सुर जान बनाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना । जात चले सुंदर बिधि नाना ॥
सुर सुंदरी करहिं कल गाना । सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी । पिता जग्य सुनि कछु हरषानी ॥
जौं महेसु मोहि आयसु देहीं । कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कहेहु नीक मोरेंहुँ मन भावा । यह अनुचित नहिं नेवत पठावा ॥
दच्छ सकल निज सुता बोलाईं । हमरें बयर तुम्हउ बिसराईं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना । तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना ॥
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी । रहइ न सीलु सनेहु न कानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जद्यपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा । जाइअ बिनु बोलेंहुँ न संदेहा ॥
तदपि बिरोध मान जहाँ कोई । तहाँ गएँ कल्यानु न होई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
भाँति अनेक संभु समुझावा । भावी बस न ग्यानु उर आवा ॥
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ । नहिं भलि बात हमारे भाएँ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
पिता भवन जब गई भवानी । दच्छ त्रास काहूँ न सनमानी ॥
सादर भलेहिं मिली एक माता । भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता । सतिहि बिलोकि जरे सब गाता ॥
सतीं जाइ देखेउ तब जागा । कतहूँ न दीख संभु कर भागा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ । प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ ॥
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा । जस यह भयउ महा परितापा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जद्यपि जग दारुन दुख नाना । सब तें कठिन जाति अवमाना ॥
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा । बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुनहु सभासद सकल मुनींदा । कही सुनी जिन्ह संकर निंदा ॥
सो फल तुरत लहब सब काहूँ । भली भाँति पछिताब पिताहूँ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
संत संभु श्रीपति अपबादा । सुनिअ जहाँ तहाँ असि मरजादा ॥
काटिअ तासु जीभ जो बसाई । श्रवन मूदि न त चलिअ पराई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जगदातमा महेसु पुरारी । जगत जनक सब के हितकारी ॥
पिता मंदमति निंदत तेही । दच्छ सुक्र संभव यह देही ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतु । उर धरि चंदमौलि वृषकेतू ॥
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा । भयउ सकल मख हाहाकारा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
समाचार सब संकर पाए । बीरभद्र करि कोप पठाए ॥
जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा । सकल सुरन्ह बिधिवत फल दीन्हा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
भै जगबिदित दच्छ गति सोई । जसि कछु संभु बिमुख के होई ॥
यह इतिहास सकल जग जानी । ताते मैं संछेप बखानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सती मरत हरि सन बर मागा । जनम जनम सिव पद अनुरागा ॥
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई । जनमीं पारबती तनु पाई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जब तें उमा सैल गृह जाई । सकल सिद्धि संपति तहँ छाई ॥
जँह तँह मुनि सु आश्रम कीन्हे । उचित बास हिम भूधर दीन्हे ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सरिता सब पुनीत जलु बहहीं । खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं ॥
सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा । गिरि पर सकल करहिं अनुरागा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सोह सैल गिरिजा गृह आएँ । जिमि जनु रामभगति के पाएँ ॥
नित नूतन मंगल गृह तासू । ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
नारि सहित मुनि पद सिरु नावा । चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा ॥
निज सोभाग्य बहुत गिरि बरना । सुता बोलि मेली मुनि चरना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी । सुता तुम्हारि सकल गुन खानी ॥
सुंदर सहज सुसील सयानी । नाम उमा अंबिका भवानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सब लच्छन संपन्न कुमारी । होइहि संतत पियहि पिआरी ॥
सदा अचल एहि कर अहिवाता । एहि तें जसु पैहहिं पितु माता ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
होइहि पूज्य सकल जग माहीं । एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं ॥
एहि कर नामु सुमिरि संसारा । त्रिय चढ़िहहिं पतिब्रत असिधारा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी । सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी ॥
अगुन अमान मातु पितु हीना । उदासीन सब संसय छीना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी । दुख दंपतिहि उमा हरषानी ॥
नारदहूँ यह भेद न जाना । दसा एक समुझब बिलगाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना । पुलक सरीर भरे जल नैना ॥
होइ न मूषा देवरिषि भाषा । उमा सो बचन हृदयँ धरि राखा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू । मिलन कठिन मन भा संदेहू ॥
जानि कुअवसर प्रीति दुराई । सखी उछंग बैठी पुनि जाई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
झूठि न होइ देवरिषि बानी । सोचहिं दंपति सखीं सयानी ॥
उर धरि धीर कहहु गिरिराऊ । कहहु नाथ का करिअ उपाऊ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तदपि एक मैं कहउँ उपाई । होइ करै जौं दैउ सहाई ॥
जस बर मैं बरनेउ तुम्ह पाहीं । मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जे जे बर के दोष बखाने । ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने ॥
जौं बिबाहु संकर सन होई । दोषउ गुन सम कह सबु कोई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं । बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं ॥
भानु कृसानु सर्व रस खाहीं । तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई । सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई ॥
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं । रबि पावक सुरसरि की नाईं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना । कबहुँ न संत करहिं तेंहि पाना ॥
सुरसरि मिलें सो पावन जैसेँ । ईस अनीसहि अंतर तैसें ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
संभु सहज समरथ भगवाना । एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना ॥
दुराराध्य पै अहहिं महेसू । आसुतोष पुनि किएँ कलेसू ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी । भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी ॥
जद्यपि बर अनेक जग माहीं । एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बर दायक प्रनतारति भंजन । कृपासिंधु सेवक मन रंजन ॥
इच्छित फल बिनु सिव अवराधें । लहिअ न कोटि जोग जप साधें ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गएऊ । आगिल चरित सुनहु जस भएऊ ॥
पतिहि एकांत पाइ कह मैना । नाथ न मैं समुझे मुनि बैना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जौं घरु बरु कुलु होइ अनुपा । करिअ बिबाहु सुता अनरूपा ॥
न त कन्या बरु रहउ कुआरी । कंत उमा मम प्रानपिआरी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू । गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू ॥
सोइ बिचारि पति करिहु बिबाहू । जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अस कहि परी चरन धरि सीसा । बोले सहित सनेह गिरीसा ॥
बरु पावक प्रगटे ससि माहीं । नारद बचनु अन्यथा नाहीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू । तौ अस जाइ सिखावनु देहू ॥
करै सो तपु जेहिं मिलिहिं महेसू । आन उपायँ न मिटिहि कलेसू ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
नारद बचन सगर्भ सहेतू । सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू ॥
अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका । सबहि भाँति संकर अकलंका ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सुनि पति बचन हरषि मन माहीं । गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं ॥
उमहि बिलोकि नयन भरे बारी । सहित सनेह गोद बैठारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बारहिं बार लेति उर लाई । गदगद कंठ न कछु कहि जाई ॥
जगत मातु सर्वज्ञ भवानी । मातु सुखद बोलीं मृदु बानी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
करहि जाइ तपु सैलकुमारी । नारद कहा सो सत्य बिचारी ॥
मातु पितहि पुनि यह मत भावा । तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता । तपबल बिष्नु सकल जग त्राता ॥
तपबल संभु करहिं संघारा । तपबल सेषु धरइ महिभारा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तप अधार सब सृष्टि भवानी । करहि जाइ तपु अस जियँ जानी ॥
सुनत बचन बिसमित महतारी । सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
मातु पितहि बहुबिधि समुझाई । चलीं उमा तप हित हरषाई ॥
प्रिय परिवार पिता अरु माता । भए बिकल मुख आव न बाता ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
उर धरि उमा प्रानपति चरना । जाइ बिपिन लागीं तपु करना ॥
अति सुकुमार न तनु तप जोगू । पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कछु दिन भोजनु बारि बतासा । किए कठिन कछु दिन उपबासा ॥
बेल पाती महि परइ सुखाई । तीनि सहस संवत सोइ खाई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
पुनि परिहरे सुखानेउ परना । उमहि नामु तब भयउ अपरना ॥
देखि उमहि तप खीन सरीरा । ब्रह्मगिरा भै गगन गंभीरा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अस तपु काहूँ न कीन्ह भवानी । भए अनेक धीर मुनि ग्यानी ॥
अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी । सत्य सदा संतत सुचि जानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
आवै पिता बोलावन जबहीं । हठ परिहरि घर जाऐहु तबहीं ॥
मिलिहिं तुम्हहि जब सप्त ऋषीसा । जानेहु तब प्रमान बागीसा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सुनत गिरा बिधि गगन बखानी । पुलक गात गिरिजा हरषानी ॥
उमा चरित सुंदर मैं गावा । सुनहु संभु कर चरित सुहावा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जब तें सतीं जाइ तनु त्यागा । तब तें सिव मन भयउ बिरागा ॥
जपहिं सदा रघुनायक नामा । जहाँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कतहुँ मुनीन्ह उपदेसहिं ग्याना । कतहुँ राम गुन करहिं बखाना ॥
जद्यपि अकाम तदपि भगवाना । भगत बिरह दुख दुखित सुजाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती । नित नै होइ राम पद प्रीती ॥
नेमु प्रेमु संकर कर देखा । अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला । रूप सील निधि तेज बिसाला ॥
बहु प्रकार संकरहि सराहा । तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बहुबिधि राम सिवहि समुझावा । पारबती कर जनमु सुनावा ॥
अति पुनीत गिरिजा कै करनी । बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कह सिव जद्यपि उचित अस नाहीं । नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं ॥
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा । परम धरमु यह नाथ हमारा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी । बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ॥
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना । भक्ति बिबेक धरम जुत रचना ॥
कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ । अब उर राखेहु जो हम कहेऊ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अंतरधान भए अस भाषी । संकर सोउ मूरति उर राखी ॥
तबहिं सप्तऋषि सिव पहिं आए । बोले प्रभु अति बचन सुहाए ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
ऋषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी । मूरतिमंत तपस्या जैसी ॥
बोले मुनि सुनु सैलकुमारी । करहु कवन कारन तप भारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
केहि अवराधहु का तुम्ह चहहु । हम सन सत्य मरमु किन कहहु ॥
कहत बचन मनु अति सकुचाई । हँसिहहु सुनि हमारी जड़ताई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
मनु हठ परा न सुनइ सिखावा । चहत बारि पर भीति उठावा ॥
नारद कहा सत्य सोइ जाना । बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
दच्छसुतन्ह उपदेसिहि जाई । तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई ॥
चित्रकेतु कर घर उन घाला । कनककसिपु कर पुनि असि हाला ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी । अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी ॥
मन कपटी तन सज्जन चीहा । आपु सरिस सबही चह कीहा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तेहि के बचन मानि बिस्वासा । तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा ॥
निर्गुन निलज कुबेष कपाली । अकुल अगेंह दिगंबर ब्याली ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कहहु कवन सुखु अस बर पाएँ । भल भूलिहु ठग के बौराएँ ॥
पंच कहें सिवें सती बिबाही । पुनि अवडेरि मराइनि ताही ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अजहुँ मानहु कहा हमारा । हम तुम्ह कहुँ बर नीक बिचारा ॥
अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला । गावहिं बेद जासु जस लीला ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
दूपन रहित सकल गुन रासी । श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी ॥
अस बरु तुम्हहि मिलावब आनी । सुनत बिहसि कह बचन भवानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सत्य कहहु गिरिभव तनु एहा । हठ न छूट छुटे बर देहा ॥
कनकउ पुनि पषान तें होई । जारेंउ सहजु न परिहर सोई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
नारद बचन न मैं परिहरऊँ । बसउ भवनु उजड़उ नहिं डरऊँ ॥
गुर के बचन प्रतीति न जेही । सपनेहुँ सुगम न सुख सिद्धि तेही ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा । सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा ॥
अब मैं जनमु संभु हित हारा । को गुन दूपन करै बिचारा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जौं तुम्हरें हठ हृदयँ बिसेषी । रहि न जाइ बिनु किएँ बरेखी ॥
तौ कौतुकिअह आलसु नाहीं । बर कन्या अनेक जग माहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जनम कोटि लगि रगर हमारी । बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी ॥
तजउँ न नारद कर उपदेसु । आपु कहहिं सत बार महेसु ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
मैं पा परउँ कहउँ जगदंबा । तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा ॥
देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी । जय जय जगदंबिके भवानी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जाइ मुनीन्ह हिमवंतु पठाए । करि बिनती गिरिजहि गृह ल्याए ॥
बहुरि समरपि सिव पहिं जाई । कथा उमा के सकल सुनाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
भए मगन सिव सुनत सनेहा । हरषि सप्तऋषि गवने गेहा ॥
मनु थिर करि तब संभु सुजाना । लगे करन रघुनायक ध्याना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तारकु असुर भयउ तेहि काला । भुज प्रताप बल तेज बिसाला ॥
तेहिं सब लोक लोकपति जीते । भए देव सुख संपति रीते ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अजर अमर सो जीति न जाई । हारे सुर करि बिबिध लराई ॥
तब बिरंचि सन जाइ पुकारे । देखे बिधि सब देव दुखारे ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
मोर कहा मुनि करहु उपाई । होइहि ईस्वर करिहि सहाई ॥
सतीं जो तजी दच्छ मख देहा । जनमीं जाइ हिमाचल गेहा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
तेहि तपु कीन्ह संभु पति लागी । सिव समाधि बैठे सब त्यागी ॥
जद्यपि अहह असमंजस भारी । तदपि बात एक सुनु हमारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं । करै छोभु संकर मन माहीं ॥
तब हम जाइ सिवहि सिर नाई । करवाउब बिबाहु बरिआई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
एहि बिधि भलेंहि देवहित होई । मत अति नीक कहहिं सब कोई ॥
अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू । प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा । श्रुति कह परम धरम उपकारा ॥
पर हित लागि तजइ जो देही । संतत संत प्रसंसहि तेही ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अस कहि चले सबहि सिरु नाई । सुमन धनुष कर सहित सहाई ॥
चलत मार अस हृदयँ बिचारा । सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तब आपन प्रभाउ बिस्तारा । निज बस कीन्ह सकल संसारा ॥
कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू । छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
ब्रह्मचरज ब्रत संजम नाना । धीरज धरम ग्यान बिग्याना ॥
सदाचार जप जोग बिरागा । सभय बिबेक कटकु सब भागा ॥
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छंद 83बाल काण्ड
भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे ।
सदग्रंथ पर्वत कंदरन्हि महुँ जाए तेहि अवसर दूरे ॥
होनिहार का करतार को रखवार जग खरभर परा ।
दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहूँ कोपि कर धनु सर धरा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सब के हृदयँ मदन अभिलाषा । लता निहारि नवहिं तरु साखा ॥
नदी उमगि अंबुधि कहुँ धाई । संगम करहिं तलाव तलाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जहँ असि दसा जड़न्ह के बरनी । को कहि सकइ सचेतन करनी ॥
पसु पच्छी नभ जल थल चारी । भए कामबस समय बिसारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
मदन अंध ब्याकुल सब लोका । निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका ॥
देव दनुज नर किंनर ब्याला । प्रेत पिसाच भूत बेताला ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
इन्ह के दसा न कहौं बखानी । सदा काम के चेरे जानी ॥
सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी । तेपि कामबस भए बियोगी ॥
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छंद 84बाल काण्ड
भए कामबस जोगीस तापस पामरन्हि की को कहै ।
देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे ॥
अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयँ ।
दुउ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
उभय घरी अस कौतुक भयउ । जौं लगि कामु संभु पहिं गयउ ॥
सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू । भयउ जथास्थिति सब संसारू ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
भए तुरत सब जीव सुखारे । जिमि मद उतरि गएँ मतवारे ॥
रुद्रहि देखि मदन भय माना । दुराधर्ष दुर्गम भगवाना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
फिरत लाज कछु करि नहिं जाई । मरनु ठानि मन रचेसि उपाई ॥
प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा । कुसुमित नव तरु राजि बिराजा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बन उपबन बापिका तड़ागा । परम सुभग सब दिसा विभागा ॥
जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा । देखि मुएहूँ मन मनसिज जागा ॥
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छंद 85बाल काण्ड
जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही ।
सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही ॥
बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा ।
कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
देखि रसाल बिटप बर साखा । तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा ॥
सुमन चाप निज सर संधाने । अति रिसि तांकि श्रवन लगि ताने ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
छाड़े बिषम बिसिख उर लागे । छूटि समाधि संभु तब जागे ॥
भयउ ईस मन छोभु बिसेषी । नयन उघारि सकल दिसि देखी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सौरभ पल्लव मदनु बिलोका । भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका ॥
तब सिवँ तीसर नयन उघारा । चितवत कामु भयउ जरि छारा ॥
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छंद 86बाल काण्ड
जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई ।
रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई ॥
अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही ।
प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जब जदुबंस कृष्ण अवतारा । होइहि हरन महा महिभारा ॥
कृष्ण तनय होइहि पति तोरा । बचनु अन्यथा होइ न मोरा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
रति गवनी सुनि संकर बानी । कथा अपर अब कहउँ बखानी ॥
देवन्ह समाचार सब पाए । ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सब सुर बिष्णु बिरंचि समेता । गए जहाँ सिव कृपानिकेता ॥
पृथक पृथक तिन्ह कीन्ह प्रसंसा । भए प्रसन्न चंद अवतंसा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बोले कृपासिंधु बृषकेतू । कहहु अमर आए केहि हेतु ॥
कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी । तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
यह उत्सव देखिअ भरि लोचन । सोइ कछु करहु मदन मद मोचन ॥
कामु जारि रति कहुँ बर दीन्हा । कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सासति करि पुनि करहिं पसाऊ । नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ ॥
पारबतीं तपु कीन्ह अपारा । करहु तासु अब अंगीकारा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी । ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी ॥
तब देवन्ह दुंदुभीं बजाई । बरषि सुमन जय जय सुर साई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अवसर जानि सप्तऋषि आए । तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए ॥
प्रथम गए जहाँ रहीं भवानी । बोले मधुर बचन छल सानी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुनि बोलीं मुसुकाइ भवानी । उचित कहेहु मुनिवर बिग्यानी ॥
तुम्हरें जान कामु अब जारा । अब लगि संभु रहे सबिकारा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
हमरें जान सदा सिव जोगी । अज अनवद्य अकाम अभोगी ॥
जौं मैं सिव सेये अस जानी । प्रीति समेत कर्म मन बानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा । करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा ॥
तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा । सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा ॥
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