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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड चौपाई 4

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

भल अनभल निज निज करतूती । लहत सुजस अपलोक बिभूती ॥ सुधा सुधाकर सुरसरि साधू । गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू ॥ गुन अवगुन जानत सब कोई । जो जेहि भाव नीक तेहि सोई ॥

Bhala anabhala nija nija karatuti. Lahata sujasa apaloka bibhuti. Sudha sudhakara surasari sadhu. Garala anala kalimala sari byadhu. Guna avaguna janata saba koi. Jo jehi bhava nika tehi soi.

अ
हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

भले और बुरे अपनी-अपनी करनीके अनुसार सुन्दर यश और अपयशकी सम्पत्ति पाते हैं। अमृत, चन्द्रमा, गङ्गाजी और साधु एवं विष, अग्नि, कलियुगके पापोंकी नदी अर्थात् कर्मनाशा और हिंसा करनेवाला व्याध, इनके गुण-अवगुण सब कोई जानते हैं; किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है ॥ ४-५ ॥

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