वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ। वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥ ४ ॥
Sitaramagunagramapunyaranyaviharinau. Vande vishuddhavijnanau kavishwarakapishwarau.
श्रीसीतारामजीके गुणसमूहरूपी पवित्र वनमें विहार करनेवाले, विशुद्ध विज्ञानसम्पन्न कवीश्वर श्रीवाल्मीकिजी और कपीश्वर श्रीहनुमान्जीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ४ ॥
इस श्लोक में आदि कवि वाल्मीकि (कवीश्वर) और हनुमान जी (कपीश्वर) की वंदना की गई है। उन्हें 'विशुद्ध विज्ञान संपन्न' कहा गया है। सीताराम जी के गुणों का समूह यहाँ एक पवित्र वन के समान है, जिसमें ये दोनों निरंतर विहार करते हैं (अर्थात् उनके चरित्र का गान व श्रवण करते हैं)।
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