वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
जदपि कबित रस एकउ नाहीं । राम प्रताप प्रगट एहि माहीं ॥ सोइ भरोस मोरें मन आवा । केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा ॥
Jadapi kabita rasa ekau nahin. Rama pratapa pragata ehi mahin. Soi bharosa moren mana ava. Kehin na susanga badappanu pava.
यद्यपि मेरी इस रचनामें कविताका एक भी रस नहीं है, तथापि इसमें श्रीरामजीका प्रताप प्रकट है। मेरे मनमें यही एक भरोसा है। भले संगसे भला, किसने बड़प्पन नहीं पाया?॥ ४॥
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