वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
दो०—सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग । लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग ॥ २ ॥
Suni samujhahi jan mudit man majjahi ati anurag. Lahahi chari phal achhat tanu sadhu samaj prayag.
जो मनुष्य इस संत-समाजरूपी तीर्थराजका प्रभाव प्रसन्न मनसे सुनते और समझते हैं और फिर अत्यन्त प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीरके रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष— चारों फल पा जाते हैं॥ २ ॥
जो लोग इस संत समाज रूपी प्रयाग का प्रभाव प्रसन्नता से सुनते-समझते हैं और प्रेमपूर्वक इसमें गोता लगाते हैं (अर्थात् संतों की संगति करते हैं), वे इसी शरीर के रहते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों फल प्राप्त कर लेते हैं।
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