वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी । कहत साधु महिमा सकुचानी ॥ सो मो सन कहि जात न कैसें । साक बनिक मनि गुन गन जैसें ॥
Bidhi hari har kabi kobid bani. Kahat sadhu mahima sakuchani. So mo san kahi jaat na kaisen. Saak banik mani gun gan jaisen.
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितोंकी वाणी भी संत-महिमाका वर्णन करनेमें सकुचाती है; वह मुझसे किस प्रकार नहीं कही जाती, जैसे साग-तरकारी बेचनेवालेसे मणियोंके गुणसमूह नहीं कहे जा सकते ॥ ६ ॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पंडितों की वाणी भी संतों की महिमा का वर्णन करने में संकोच करती है। तुलसीदास जी कहते हैं कि वह महिमा मुझसे वैसे ही नहीं कही जा सकती, जैसे एक साग-सब्जी बेचने वाला मणियों के गुणों का वर्णन नहीं कर सकता।
आगे पढ़ें — बाल काण्ड के सभी पद · श्रीरामचरितमानस