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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

चौपाई 5

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधात सुहाई ॥ बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं । फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं ॥

Sath sudharahin satsangati pai. Paras paras kudhat suhai. Bidhi bas sujan kusangat parahin. Phani mani sam nij gun anusarahin.

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारसके स्पर्शसे लोहा सुहावना हो जाता है (सुन्दर सोना बन जाता है)। किन्तु दैवयोगसे यदि कभी सज्जन कुसंगतिमें पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँपकी मणिके समान अपने गुणोंका ही अनुसरण करते हैं (अर्थात् जिस प्रकार साँपका संसर्ग पाकर भी मणि उसके विषको ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाशको नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टोंके संगमें रहकर भी दूसरोंको प्रकाश ही देते हैं, दुष्टोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता) ॥ ५ ॥

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही सत्संग पाकर दुष्ट व्यक्ति भी सुधर जाते हैं। इसके विपरीत, यदि भाग्यवश सज्जन कुसंगति में पड़ भी जाएं, तो वे सांप की मणि के समान अपने ही गुणों का अनुसरण करते हैं (अर्थात दुष्टों का प्रभाव उन पर नहीं पड़ता और वे मणि की तरह अपना प्रकाश देते रहते हैं)।

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श्रीरामचरितमानस चौपाई 5 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik