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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

चौपाई 5

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना । पर अघ सुनइ सहस दस काना ॥ बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही । संतत सुरानीक हित जेही ॥

Puni pranavau prithuraj samana. Par agh sunai sahas das kana. Bahuri sakra sam binavau tehi. Santat suranik hit jehi.

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

पुनः उनको राजा पृथु (जिन्होंने भगवान्‌का यश सुननेके लिये दस हजार कान माँगे थे) के समान जानकर प्रणाम करता हूँ, जो दस हजार कानोंसे दूसरोंके पापोंको सुनते हैं। फिर इन्द्रके समान मानकर उनकी विनय करता हूँ, जिनको सुरा (मदिरा) नीकी और हितकारी मालूम देती है [इन्द्रके लिये भी सुरानीक अर्थात् देवताओंकी सेना हितकारी है]॥ ५ ॥

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

दुष्टों को राजा पृथु के समान मानकर प्रणाम किया गया है क्योंकि वे दूसरों के पाप दस हजार कानों से सुनते हैं (जैसे पृथु ने भगवान का यश सुनने के लिए दस हजार कान मांगे थे)। उन्हें इंद्र के समान भी बताया गया है क्योंकि उन्हें सुरा (मदिरा) हितकारी लगती है (जबकि इंद्र के लिए सुरानीक अर्थात् देवसेना हितकारी होती है, यह श्लेष का प्रयोग है)।

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श्रीरामचरितमानस चौपाई 5 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik