वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
दो०—जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान । कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान ॥ १ ॥
Jatha suanjan anji drig sadhak siddh sujan. Kautuk dekhat sail ban bhootal bhoori nidhan.
जैसे सिद्धाञ्जनको नेत्रोंमें लगाकर साधक, सिद्ध और सुजान पर्वतों, वनों और पृथ्वीके अंदर कौतुकसे ही बहुत-सी खानें देखते हैं ॥ १ ॥
यहाँ दृष्टांत दिया गया है कि जिस प्रकार सिद्ध अंजन को आँखों में लगाकर साधक और ज्ञानी जन पर्वतों, वनों और पृथ्वी के भीतर छिपी हुई बहुत सी खानों को आसानी से देख लेते हैं, उसी प्रकार गुरु की कृपा से ज्ञान चक्षु खुल जाते हैं।
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