वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥ दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
Shrigur pad nakh mani gan joti. Sumirat dibya drishti hiyan hoti. Dalan moh tam so saprakasoo. Bade bhag ur aavai jaasoo.
श्रीगुरु महाराजके चरण-नखोंकी ज्योति मणियोंके प्रकाशके समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदयमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है; वह जिसके हृदयमें आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं॥ ३ ॥
गुरु के चरण नखों की कांति को मणियों के प्रकाश के समान बताया गया है। इस प्रकाश का स्मरण करने मात्र से ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है और अज्ञान का अंधकार पूरी तरह मिट जाता है।
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