वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के । मिटहिं दोष दुख भव रजनी के ॥ सूझहिं राम चरित मनि मानिक । गुपुत प्रगट जहाँ जो जेहि खानिक ॥
Ugharahi bimal bilochan hee ke. Mitahi dosh dukh bhav rajani ke. Soojhahi ram charit mani manik. Guput pragat jahan jo jehi khanik.
उसके हृदयमें आते ही हृदयके निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसाररूपी रात्रिके दोष-दुःख मिट जाते हैं एवं श्रीरामचरित्ररूपी मणि और माणिक्य, गुप्त और प्रकट जहाँ जो जिस खानमें है, सब दिखायी पड़ने लगते हैं— ॥ ४ ॥
गुरु पद नख की ज्योति हृदय में आते ही हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं। संसार रूपी अज्ञान की रात्रि के सारे दोष और दुख मिट जाते हैं और श्रीराम के चरित्र रूपी मणि-माणिक्य जहाँ भी गुप्त या प्रकट हों, दिखाई देने लगते हैं।
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