वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके । राम लखन सम प्रिय तुलसी के ॥ बरनत बरन प्रीति बिलगाती । ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती ॥
Kahat sunat sumirat suthi neeke. Raam lakhan sam priya tulasi ke. Barnat baran preeti bilgaati. Brahm jeev sam sahaj sanghaati.
ये कहने, सुनने और स्मरण करनेमें बहुत ही अच्छे (सुन्दर और मधुर) हैं; तुलसीदासको तो श्रीराम-लक्ष्मणके समान प्यारे हैं। इनका ('र' और 'म' का) अलग-अलग वर्णन करनेमें प्रीति बिलगाती है (अर्थात् बीजमन्त्रकी दृष्टिसे इनके उच्चारण, अर्थ और फलमें भिन्नता दीख पड़ती है) परन्तु हैं ये जीव और ब्रह्मके समान स्वभावसे ही साथ रहनेवाले (सदा एकरूप और एकरस) ॥ २ ॥
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