वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
साधु चरित सुभ चरित कपासू । निरस बिसद गुनमय फल जासू ॥ जो सहि दुख परछिद्र दुरावा । बंदनीय जेहिं जग जस पावा ॥
Sadhu charit subh charit kapasu. Niras bisad gunamay phal jaasu. Jo sahi dukh parachhidra durava. Bandaniya jehin jag jas pava.
संतोंका चरित्र कपासके चरित्र (जीवन)-के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। (कपासकी डोडी नीरस होती है, संत-चरित्रमें भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है; कपास उज्ज्वल होता है, संतका हृदय भी अज्ञान और पापरूपी अन्धकारसे रहित होता है, इसलिये वह विशद है, और कपासमें गुण (तन्तु) होते हैं, इसी प्रकार संतका चरित्र भी सद्गुणोंका भण्डार होता है, इसलिये वह गुणमय है।) [जैसे कपासका धागा सूईके किये हुए छेदको अपना तन देकर ढक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जानेका कष्ट सहकर भी वस्त्रके रूपमें परिणत होकर दूसरोंके गोपनीय स्थानोंको ढकता है उसी प्रकार] संत स्वयं दुःख सहकर दूसरोंके छिद्रों (दोषों)-को ढकता है, जिसके कारण उसने जगत्में वन्दनीय यश प्राप्त किया है ॥ ३ ॥
संतों के चरित्र की तुलना कपास से की गई है। जैसे कपास नीरस (विषयासक्ति रहित), विशद (उज्ज्वल) और गुणमय (तंतुओं वाला) होता है, वैसे ही संत सद्गुणों के भंडार होते हैं। जैसे कपास स्वयं कष्ट सहकर वस्त्र बनकर दूसरों के शरीर को ढकता है, वैसे ही संत स्वयं दुख सहकर दूसरों के दोषों (छिद्रों) को ढकते हैं और संसार में वंदनीय होते हैं।
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