वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ। अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥ ३ (क)॥
Bandau sant saman chit hit anahit nahin koi. Anjali gat subh suman jimi sam sugandh kar doi.
मैं संतोंको प्रणाम करता हूँ, जिनके चित्तमें समता है, जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु! जैसे अञ्जलिमें रखे हुए सुन्दर फूल [जिस हाथने फूलोंको तोड़ा और जिसने उनको रखा उन ] दोनों ही हाथोंको समानरूपसे सुगन्धित करते हैं [वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनोंका ही समानरूपसे कल्याण करते हैं]॥ ३ (क)॥
संतों के समदर्शी स्वभाव का वर्णन है। वे मित्र और शत्रु दोनों के प्रति समान भाव रखते हैं। जिस प्रकार अंजलि (हाथों) में रखे फूल, तोड़ने वाले और रखने वाले दोनों हाथों को समान सुगंध देते हैं, वैसे ही संत दोनों का कल्याण करते हैं।
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