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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

दोहा 3

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ। अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥ ३ (क)॥

Bandau sant saman chit hit anahit nahin koi. Anjali gat subh suman jimi sam sugandh kar doi.

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

मैं संतोंको प्रणाम करता हूँ, जिनके चित्तमें समता है, जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु! जैसे अञ्जलिमें रखे हुए सुन्दर फूल [जिस हाथने फूलोंको तोड़ा और जिसने उनको रखा उन ] दोनों ही हाथोंको समानरूपसे सुगन्धित करते हैं [वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनोंका ही समानरूपसे कल्याण करते हैं]॥ ३ (क)॥

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

संतों के समदर्शी स्वभाव का वर्णन है। वे मित्र और शत्रु दोनों के प्रति समान भाव रखते हैं। जिस प्रकार अंजलि (हाथों) में रखे फूल, तोड़ने वाले और रखने वाले दोनों हाथों को समान सुगंध देते हैं, वैसे ही संत दोनों का कल्याण करते हैं।

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श्रीरामचरितमानस दोहा 3 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik