वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ ५ ॥
Bandau guru pad kanj kripa sindhu nararoop hari. Mahamoha tam punj jaasu bachan rabi kar nikar.
मैं उन गुरु महाराजके चरणकमलकी वन्दना करता हूँ, जो कृपाके समुद्र और नररूपमें श्रीहरि ही हैं और जिनके वचन महामोहरूपी घने अन्धकारके नाश करनेके लिये सूर्य-किरणोंके समूह हैं॥ ५ ॥
गुरु की महिमा का वर्णन है, जहाँ उन्हें साक्षात् नर रूप में श्रीहरि (भगवान) और कृपा का सागर बताया गया है। उनके वचन सूर्य की किरणों के समान हैं, जो महामोह (अज्ञान) रूपी घने अंधकार को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं।
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