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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

चौपाई 3

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

तेज कृसानु रोष महिषेसा । अघ अवगुन धन धनी धनेसा ॥ उदय केत सम हित सब ही के । कुंभकरन सम सोवत नीके ॥

Tej krisanu rosh mahishesa. Agh avagun dhan dhani dhanesa. Uday ket sam hit sab hi ke. Kumbhakaran sam sovat nike.

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो तेज (दूसरोंको जलानेवाले ताप) में अग्नि और क्रोधमें यमराजके समान हैं, पाप और अवगुणरूपी धनमें कुबेरके समान धनी हैं, जिनकी बढ़ती सभीके हितका नाश करनेके लिये केतु (पुच्छल तारे) के समान है, और जिनके कुम्भकर्णकी तरह सोते रहनेमें ही भलाई है॥ ३ ॥

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

दुष्टों का वर्णन करते हुए उन्हें ताप में अग्नि और क्रोध में यमराज (महिषेसा) के समान बताया गया है। वे पाप और अवगुण रूपी धन के कुबेर हैं। उनकी उन्नति पुच्छल तारे (केतु) के समान है जो सबका हित नाश करती है, और कुंभकर्ण की तरह उनके सोते रहने में ही सबकी भलाई है।

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श्रीरामचरितमानस चौपाई 3 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik