वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
तेज कृसानु रोष महिषेसा । अघ अवगुन धन धनी धनेसा ॥ उदय केत सम हित सब ही के । कुंभकरन सम सोवत नीके ॥
Tej krisanu rosh mahishesa. Agh avagun dhan dhani dhanesa. Uday ket sam hit sab hi ke. Kumbhakaran sam sovat nike.
जो तेज (दूसरोंको जलानेवाले ताप) में अग्नि और क्रोधमें यमराजके समान हैं, पाप और अवगुणरूपी धनमें कुबेरके समान धनी हैं, जिनकी बढ़ती सभीके हितका नाश करनेके लिये केतु (पुच्छल तारे) के समान है, और जिनके कुम्भकर्णकी तरह सोते रहनेमें ही भलाई है॥ ३ ॥
दुष्टों का वर्णन करते हुए उन्हें ताप में अग्नि और क्रोध में यमराज (महिषेसा) के समान बताया गया है। वे पाप और अवगुण रूपी धन के कुबेर हैं। उनकी उन्नति पुच्छल तारे (केतु) के समान है जो सबका हित नाश करती है, और कुंभकर्ण की तरह उनके सोते रहने में ही सबकी भलाई है।
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