वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
बालमीक नारद घटजोनी । निज निज मुखनि कही निज होनी ॥ जलचर थलचर नभचर नाना । जे जड़ चेतन जीव जहाना ॥
Balamik narad ghatajoni. Nij nij mukhani kahi nij honi. Jalachar thalachar nabhachar nana. Je jad chetan jiv jahana.
वाल्मीकिजी, नारदजी और अगस्त्यजीने अपने-अपने मुखोंसे अपनी होनी(जीवनका वृत्तान्त) कही है। जलमें रहनेवाले, जमीनपर चलनेवाले और आकाशमें विचरनेवाले नाना प्रकारके जड़-चेतन जितने जीव इस जगत्में हैं, ॥ २ ॥
वाल्मीकि जी, नारद जी और अगस्त्य जी (घटजोनी) ने अपने-अपने मुख से अपने जीवन का वृत्तांत कहा है। जगत में जल, थल और आकाश में विचरने वाले जितने भी जड़-चेतन जीव हैं (उनका आगे की चौपाई से संबंध है)।
आगे पढ़ें — बाल काण्ड के सभी पद · श्रीरामचरितमानस