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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड छंद 185

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता । गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता ॥ पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई । जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई ॥ जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा । अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा ॥ जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा । निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा ॥ जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा । सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा ॥ जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा । मन बच क्रम बानी छाडि सयानी सरन सकल सुरजूथा ॥ सारद श्रुति सेव ऋषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना । जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना ॥ भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा । मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे देवताओंके स्वामी, सेवकोंको सुख देनेवाले, शरणागतकी रक्षा करनेवाले भगवान! आपकी जय हो। हे गो-ब्राह्मणोंके हितकर, असुरोंका विनाश करनेवाले, सिंधुसुता (श्रीलक्ष्मीजी) के प्रिय स्वामी! आपकी जय हो। आपकी लीला अद्भुत है, उसका भेद कोई नहीं जानता; जो स्वभावसे ही कृपालु और दीनदयालु हैं, वे ही हमपर कृपा करें। हे अविनाशी, सबके हृदयमें निवास करनेवाले, सर्वव्यापक परमानन्दस्वरूप, इन्द्रियोंसे परे, पवित्रचरित्र, मायारहित मुकुन्द! आपकी जय हो। जिनके लिये विरक्त और मोहसे सर्वथा छूटे हुए मुनिवृन्द भी अत्यन्त अनुरागी होकर रात-दिन ध्यान करते हैं और गुणगान गाते हैं, उन सच्चिदानन्दकी जय हो। जिन्होंने बिना किसी दूसरे संगी अथवा सहायकके तीन प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न की, वे पापोंका नाश करनेवाले भगवान हमारी सुधि लें। हम न भक्ति जानते हैं, न पूजा। जो संसारके भयका नाश करनेवाले, मुनियोंके मनको आनन्द देनेवाले और विपत्तियोंके समूहका नाश करनेवाले हैं, उन भगवानकी शरण हम सब देवताओंके समूह मन, वचन और कर्मसे चतुराई छोड़कर आये हैं। सरस्वती, वेद, शेषजी और सम्पूर्ण ऋषि भी जिनको नहीं जानते, जिन्हें दीन प्रिय हैं, ऐसा वेद पुकारकर कहते हैं, वे ही श्रीभगवान हमपर दया करें। हे संसाररूपी समुद्रके [मथनेके] लिये मंदराचलरूप, सब प्रकारसे सुन्दर, गुणोंके धाम और सुखोंकी राशि नाथ! आपके चरणकमलोंमें मुनि, सिद्ध और सारे देवता भयसे अत्यन्त व्याकुल होकर नमस्कार करते हैं।

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श्रीरामचरितमानस छंद 185 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik