वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली । कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली ॥ आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकलहियँ हरषित भई । अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई ॥
कौन किसे जाने-पहिचाने! आनंद के वश हुई सब दूलह बने हुए ब्रह्म का परछन करने चलीं । मनोहर गान हो रहा है । मधुर-मधुर नगाड़े बज रहे हैं, देवता फूल बरसा रहे हैं, बड़ी अच्छी शोभा है । आनंदकन्द दूलह को देखकर सब स्त्रियाँ हृदय में हर्षित हुईं । उनके कमल सरीखे नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल उमड़ आया और सुंदर अंगों में पुलकावली छा गई ॥
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