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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड छंद 323

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं । सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं ॥ मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहें । भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहैं ॥ १ ॥ कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो । एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो ॥ सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेमु काहुँ न लखि परै । मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

कुलाचार करके गुरुजी प्रसन्न होकर गौरीजी, गणेशजी और ब्राह्मणोंकी पूजा करा रहे हैं। देवता प्रकट होकर पूजा ग्रहण करते हैं, आशीर्वाद देते हैं और अत्यन्त सुख पा रहे हैं। मधुपर्क आदि जिस किसी भी मांगलिक पदार्थकी मुनि जिस समय मनमें चाह करते हैं, सेवकगण उसी समय सोनेकी परातों और कलशोंमें भरकर वे पदार्थ लिये तैयार रहते हैं ॥ १ ॥ स्वयं सूर्यदेव प्रेमसहित अपने कुलकी सब रीतियाँ बता देते हैं और वे सब आदरपूर्वक की जा रही हैं। इस प्रकार देवताओंकी पूजा कराके मुनियोंने सीताजीको सुंदर सिंहासन दिया। श्रीसीताजी और श्रीरामजीका आपसमें एक-दूसरेको देखना तथा उनका परस्परका प्रेम किसीको लख नहीं पड़ता, जो बात श्रेष्ठ मन, बुद्धि और वाणीसे भी परे है, उसे कवि क्योंकर प्रकट करे ॥ २ ॥

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श्रीरामचरितमानस छंद 323 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik