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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड छंद 83

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे । सदग्रंथ पर्वत कंदरन्हि महुँ जाए तेहि अवसर दूरे ॥ होनिहार का करतार को रखवार जग खरभर परा । दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहूँ कोपि कर धनु सर धरा ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

विवेक अपने सहायकोंसहित भाग गया, उसके योद्धा रणभूमिसे पीठ दिखा गये। उस समय वे सब सद्ग्रंथरूपी पर्वतकी कंदराओंमें जा छिपे (अर्थात् ज्ञान, वैराग्य, संयम, नियम, सदाचारादि ग्रंथोंमें ही लिखे रह गये; उनका आचरण छूट गया)। सारे जगतमें खलबली मच गयी [और सब कहने लगे] हे विधाता! अब क्या होनेवाला है, हमारी रक्षा कौन करेगा? ऐसा दो सिरवाला कौन है, जिसके लिये रतिनाथ कामदेवने कोप करके हाथमें धनुष-बाण उठाया है?

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श्रीरामचरितमानस छंद 83 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik