वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे । सदग्रंथ पर्वत कंदरन्हि महुँ जाए तेहि अवसर दूरे ॥ होनिहार का करतार को रखवार जग खरभर परा । दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहूँ कोपि कर धनु सर धरा ॥
विवेक अपने सहायकोंसहित भाग गया, उसके योद्धा रणभूमिसे पीठ दिखा गये। उस समय वे सब सद्ग्रंथरूपी पर्वतकी कंदराओंमें जा छिपे (अर्थात् ज्ञान, वैराग्य, संयम, नियम, सदाचारादि ग्रंथोंमें ही लिखे रह गये; उनका आचरण छूट गया)। सारे जगतमें खलबली मच गयी [और सब कहने लगे] हे विधाता! अब क्या होनेवाला है, हमारी रक्षा कौन करेगा? ऐसा दो सिरवाला कौन है, जिसके लिये रतिनाथ कामदेवने कोप करके हाथमें धनुष-बाण उठाया है?
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