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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड छंद 85

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही । सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही ॥ बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा । कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

मरे हुए मनमें भी कामदेव जागने लगा, वनकी सुंदरता कही नहीं जा सकती। कामरूपी अग्निका सच्चा मित्र शीतल-मंद-सुगंधित पवन चलने लगा। सरोवरोंमें अनेकों कमल खिल गये, जिनपर सुंदर भौंरोंके समूह गुंजार करने लगे। राजहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे और अप्सराएँ गा-गाकर नाचने लगीं।

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श्रीरामचरितमानस छंद 85 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik