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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड छंद 99

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

कोटिहुँ बदन नहिं बने बरनत जग जननि सोभा महा । सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा ॥ छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ । अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकर तहाँ ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जगज्जननी पार्वतीजीकी महान शोभाका वर्णन करोड़ों मुखोंसे भी करते नहीं बनता। वेद, शेषजी और सरस्वतीजीतक उसे कहते हुए सकुचा जाते हैं, तब मंदबुद्धि तुलसी किस गिनतीमें है। सुंदरता और शोभाकी खान माता भवानी मंडपके बीचमें, जहाँ शिवजी थे, वहाँ गयीं। वे संकोचके मारे पति (शिवजी) के चरणकमलोंको देख नहीं सकतीं, परंतु उनका मनरूपी भौंरा तो वहीं [रस-पान कर रहा] था।

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श्रीरामचरितमानस छंद 99 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik