वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानु कर बारि । जदपि मृषा तिहुँ काल सोउ भ्रम न सकइ कोउ टारि ॥ ११७ ॥
जैसे सीपमें चाँदीकी और सूर्यकी किरणोंमें पानीकी प्रतीति होती है। यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालोंमें झूठ है, तथापि इस भ्रमको कोई हटा नहीं सकता ॥ ११७ ॥
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