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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड दोहा 117

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानु कर बारि । जदपि मृषा तिहुँ काल सोउ भ्रम न सकइ कोउ टारि ॥ ११७ ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जैसे सीपमें चाँदीकी और सूर्यकी किरणोंमें पानीकी प्रतीति होती है। यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालोंमें झूठ है, तथापि इस भ्रमको कोई हटा नहीं सकता ॥ ११७ ॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 117 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik