वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि । निज माया कै प्रबलता करि कृपानिधि लीन्हि ॥ १३७ ॥
शापको सिरपर चढ़ाकर, हृदयमें हर्षित होते हुए प्रभुने नारदजीसे बहुत विनती की और कृपानिधान भगवानने अपनी मायाकी प्रबलता खींच ली ॥ १३७ ॥
आगे पढ़ें — बाल काण्ड के सभी पद · श्रीरामचरितमानस