वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि । यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि ॥ २२२ ॥
नहीं तो [विवाह न हुआ तो] हे सखी! सुनो, हमको इनके दर्शन दुर्लभ हैं। यह संयोग तभी होता है जब हमारे पहले किये हुए पुण्य बहुत हों ॥ २२२ ॥
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