वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
हृदयँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद । जाहिं जहाँ जहाँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद ॥ २२३ ॥
सुंदर मुख और सुंदर नेत्रोंवाली स्त्रियोंके समूह हर्षित होकर फूल बरसा रही हैं। वे दोनों भाई जहाँ-जहाँ जाते हैं वहाँ-वहाँ परम आनन्द छा जाता है ॥ २२३ ॥
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