वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत । चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत ॥ २२९ ॥
नारदजीका स्मरण कर [और उसे] सब [लक्षणोंसे] देखकर सीताजीके मनमें पवित्र प्रेम उत्पन्न हुआ। वे चकित होकर सब ओर इस तरह देखने लगीं मानो डरी हुई हरिणीका बच्चा हो ॥ २२९ ॥
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