वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक । सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक ॥ २३७ ॥
खारे समुद्रमें इसका जन्म, फिर उसी समुद्रसे उत्पन्न होनेके कारण विष इसका भाई, दिनमें यह मलीन रहता है और कलंकी है। बेचारा गरीब चन्द्रमा सीताजीके मुखकी बराबरी कैसे पा सकता है ॥ २३७ ॥
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