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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड दोहा 241

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप । जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप ॥ २४१ ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

स्त्रियाँ हृदयमें हर्षित होकर अपनी-अपनी रुचिके अनुसार उन्हें देख रही हैं। मानो शृंगाररस ही परम अनुपम मूर्ति धारण किये सुशोभित हो रहा हो ॥ २४१ ॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 241 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik