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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड दोहा 257

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर । भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर ॥ २५७ ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

श्री रघुनाथजी की ओर देख-देखकर सीताजी धीरज धरकर देवताओं को मना रही हैं। उनके नेत्रों में प्रेम के आँसू भरे हैं और शरीर में रोमांच हो रहा है ॥ २५७ ॥

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