वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरूप । धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप ॥ २६८ ॥
शांत वेष है, परन्तु करनी बहुत कठोर हैं, स्वरूपका वर्णन नहीं किया जा सकता। मानो वीररस ही मुनिके शरीरको धारण करके, जहाँ सब राजा लोग हैं, वहाँ आ गया हो ॥ २६८ ॥
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