वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर । पूँछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर ॥ २६९ ॥
फिर सब देखकर, जानते हुए भी अनजानकी तरह परशुरामजी जनकसे पूछते हैं कि कहो, यह बड़ी भारी भीड़ कैसी है? उनके शरीरमें क्रोध छा गया ॥ २६९ ॥
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