वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ । अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ ॥ २७५ ॥
विश्वामित्रजीने हृदयमें हँसकर कहा - मुनिको हरा ही हरा सूझ रहा है, किन्तु यह लोहमयी खाँड़ है, ऊखकी खाँड़ नहीं है। खेद है, मुनि अब भी बेसमझ बने हुए हैं, इनके प्रभावको नहीं समझ रहे हैं ॥ २७५ ॥
आगे पढ़ें — बाल काण्ड के सभी पद · श्रीरामचरितमानस