वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल । हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल ॥ २८५ ॥
देवताओं ने नगाड़े बजाए, वे प्रभु के ऊपर फूल बरसाने लगे । जनकपुर के स्त्री-पुरुष सब हर्षित हो गए । उनका मोहमय (अज्ञान से उत्पन्न) शूल मिट गया ॥ २८५ ॥
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