वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
बसइ नगर जेहिं लच्छि करि कपट नारि बर बेषु । तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु ॥ २८९ ॥
जिस नगर में साक्षात् लक्ष्मीजी कपट से स्त्री का सुंदर वेष बनाकर बसती हैं, उस पुर की शोभा का वर्णन करने में सरस्वती और शेष भी सकुचाते हैं ॥ २८९ ॥
आगे पढ़ें — बाल काण्ड के सभी पद · श्रीरामचरितमानस