वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ । बीथीं सींचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ ॥ २९६ ॥
लोगों ने अपने-अपने घरों को सजाकर मंगलमय बना लिया । गलियों को चतुर सम से सींचा और (द्वारों पर) सुंदर चौक पुराए । (चंदन, केशर, कस्तूरी और कपूर से बने हुए एक सुगंधित द्रव को चतुरसम कहते हैं) ॥ २९६ ॥
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