वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाई नरेसु । आपु चढ़ेउ स्यंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु ॥ ३०१ ॥
उस सुंदर रथ पर राजा वशिष्ठजी को हर्षपूर्वक चढ़ाकर फिर स्वयं शिव, गुरु, गौरी और गणेशजी का स्मरण करके दूसरे रथ पर चढ़े ॥ ३०१ ॥
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